Friday, March 19, 2021

भारतेन्दु युग


                                            भारतेन्दु युग



     परिचय-

         भारतेन्दु युग (सन् 1343 से 1900) - आधुनिक काल का प्रतीभक काल है। इसे प्राचीन कविता और नयी कविता का संधि युग भी कहा जा सकता है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र इस युग के महत्त्वपूर्ण एवं प्रतिभा सम्पन्न कवि थे, जिनमें युग-प्रवर्तन और नेतृत्व की अद्भुत शमता थी। इस काल के साहित्यकार कवि की अपेक्षा समाज-सुधारक, प्रचारक और पत्रकार अधिक थे। उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में भारतीय समाज की कुरीतियों, धार्मिक मिष्याचारों, भ्रष्टाचार, छल-कपट अंग्रेजी शासन के शोषण आदि विषयों पर लिखकर भारतीय समाज को जागरूक किया। इस प्रकार इस युग को कविता में उस समय का वास्तविक चित्रण मिलता है।

     प्रमुख कवि इस युग के प्रमुख कवि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमपन', प्रतापनारायण मिश्र, अम्बिकादत्त व्यास, रायकृष्ण दास आदि हैं। 

भारतेन्दुयुगीन काव्य की प्रमुख विशेषताएं

(1) देश-प्रेम की भावना 

        भारतेन्दु युग में भारत में अंग्रेजी शासन था। भारतीय जनता का शोषण हो रहा था। इसलिए इस युग के कवियों ने विदेशी शासन के प्रति रोष व्यक्त करके जनता को जागत किया। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने लिखा है

            अंग्रेज राज सुख साज सजे सब भारी।

            पै धन विदेश चलि जात यहै अत ख्वारी ।।"

(2) जीवन का चित्रण-

        भारतेन्दु युग के कवियों ने उस समय के समाज की कुरीतियों, मार्मिक मिथ्याचार, छल-कपट, महामारी, अकाल, अंग्रेजी शासन के अत्याचार आदि का चित्रण कर जन-जीवन को जामत किया। इस काव्य में जनजीवन की स्पष्ट झाँकी मिलती है। 

(3) प्राचीन तथा नवीन का समन्वय 

       भारतेन्दुकालीन कविता में प्राचीन तथा नवीन विषयों का अद्भुत समन्वय मिलता है । इसने एक ओर राधा और कृष्ण की भक्ति के सरस एवं मधुर छन्दों की रचना की तथा दूसरी ओर समाज-सुधार, स्त्री शिक्षा, धार्मिक पाखण्डियों पर व्यंग्य आदि नवीन विषयों का समावेश किया। 

 (4) समय के अनुरूप अनुभवों का वर्णन 

      इस युग के काव्य में जीवन से सम्बन्धित अनुभवों और युग-सत्यों का वर्णन चमत्कारिक ढंग से किया गया है। इस कविता में सरसता एवं मधुरता भी पर्याप्त मात्रा में दिखायी देती है। ये कवि दायित्व के प्रति सजग हैं।

(5) भाषा-शैली-

      भारतेन्दु काल भाषा की दृष्टि से पर्याप्त समृद्ध रहा है। इस समय पद्य की भाषा बज तथा गदा की भाषा खड़ी बोली रही। खड़ी बोली पद्य का भी प्रारम्भ हो रहा था। इस काव्य में विचार तथा अनुभूति की गम्भीरता का अभाव है। कहीं-कहीं तो मात्र शब्द-जाल ही दिखायी देता है।

(6) छन्द-

      विधान भारतेन्दुकालीन कविता में प्राचीन एवं लोक प्रचलित दोनों प्रकार के छन्द मिलते हैं। कवित्त, रोला, सवैया, छप्पय आदि के अतिरिक्त लोक-प्रचलित लावनी, कजली आदि छन्दों का प्रयोग हुआ है। कहीं-कहीं संस्कृत के वर्ण वृतों को भी अपनाया है। 

(7) निष्कर्ष 

निष्कर्षत: हम देखते हैं कि भाव-पक्ष और कला-पक्ष, दोनों दृष्टियों से इस युग की कविता में प्राचीन और नवीन का समन्वय है। इस युग में देश प्रेम की कविताएँ अधिक लिखी गयी थी।




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