Friday, March 19, 2021

प्रगतिवादी काव्यधारा

 

                                       प्रगतिवादी काव्यधारा 


परिचय-

       पूंजीवाद तथा शोषण के विरोधस्वरूप साम्यवादी विचारों से प्रभावित हिन्दी कविता धारा को प्रगतिवाद नाम से पुकारा गया। इसका समय सन् 1935 से लेकर 1942 तक माना जाता है। प्रगतिवाद में सामाजिक यथार्थवाद का चित्रण मिलता है । इस काव्यधारा में कृषक और मजदूर की समस्याओं को चित्रित किया गया है। अत:इस यूग के कवि का दृष्टिकोण यथार्थवादों है।

    प्रमुख कवि 

रामविलास शर्मा, रामधारीसिंह 'दिनकर', भवानीप्रसाद मिश्र, केदारनाथ अपवाल आदि इस काव्यधारा के प्रमुख कवि हैं।


प्रगतिवादी काव्यधारा की प्रमुख विशेषताएँ

(1) परम्परागत रूढ़ियों का विरोध

          प्रगतिवादी कवि रूढ़ियों, अन्धविश्वासों का घोर विरोधी है। उसके लिए मन्दिर कुरान, मस्जिद आदि का कोई महत्व नहीं है। धर्म उसके लिए एक धोखा है। प्रगतिवादी कवि ईश्वर की सत्ता, स्वर्ग नरक, आत्मा इत्यादि पर विश्वास नहीं करता। वह तो मानव धर्म को सर्वश्रेष्ठ मानता है।

(2) दीन-हीन के प्रति सहानुभूति 

          प्रगतिवादी कवियों ने दीन-हीन, मजदूरों, किसानों के प्रति अपनी सहानुभूति व्यक्त की है। इस युग की कविता में ही पहली बार दीन हीन किसान, मजदूरों की करुण दशा का चित्रण हुआ है।

(3) सामाजिक विषमता के प्रति आक्रोश 

        प्रगतिवादी कवियों ने शोषकों के प्रति रोष व्यक्त किया है। इन कवियों के अनुसार व्यापारी जमीदार और उद्योगपति ही सामाजिक विषमता के दोषी हैं। इन्हें समाप्त किये बिना समाज में समानता स्थापित नहीं हो सकती। 

(4) क्रान्ति की भावना

       प्रगतिवादी कवि सामन्तवादी विचारधारा को समूल नष्ट करने के लिए क्रान्ति का आह्वान करते हैं। वे पुरानी रूढ़ियों को नष्ट करके शोषक वर्ग को ध्वंस करना चाहते हैं । सुमित्रानन्दन पन्त क्रान्ति का आह्वान करते हुए कहते हैं।

           आ कोकिला बरसा पाकन कण। 

            नारा हो जीर्ण पुरातन ।।"

(5) नारी चित्रण-

      प्रगतिवादी कवि ने नारी जीवन का यथार्थ चित्रण किया है। यह कवि, मजदूर और किसानों के समान नारी को भी शोषण से बचाता है। उनके लिए नारी आदर्श गृहिणी है।

(6) सरल एवं सरस भाषा-

      प्रगतिवादी कविता की भाषा सरल, सरस एवं सुबोध है। इस युग की कविता में जनसाधारण की बोलचाल की भाषा प्रयोग हुई है। इस युग का कवि संस्कृतमयी पदावली, प्रतीकात्मक और लाक्षणिक भाषा का प्रयोग नहीं करता। अतः इस युग के कवि की भाषा प्रसाद गुण युक्त है।

(7) छन्द विधान-

      प्रगतिवादी कवियों ने मुक्तक और अतुकान्त छन्दों का प्रयोग किया है, जिनमें गेयता भी मिलती है। 

(8) अलंकार-

      अलंकार के क्षेत्र में इन कवियों ने अपने प्रगतिवादी दृष्टिकोणों का परिचय दिया है। इन कवियों ने अलंकारों के रूढ़ उपमानों का त्याग कर नवीन रूपक एवं नवीन उपमानों का उपयोग किया है।

  निष्कर्ष 

       इस प्रकार प्रगतिवाद की कविता में किसान, मजदूर तथा निम्न वर्ग की दयनीय दशा के प्रति सहानुभूति प्रकट हुई है, धनी तथा सम्पन्न पूंजीवादियों के प्रति विरोध का स्वर फूटा है।


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