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अंग भाग, हिस्सा, अंश
आग अग्नि, पावक, अनल, दहन, हुताशन, धूमकेतु
असुर दनुज, दानव, दैत्य, राक्षस, निशिचर, रजनीचर
अनुपम अपूर्व, अनोखा, अद्भुत, अनूठा, अद्वितीय, अतुल
घोड़ा बाजि, हय, घोटक, तुरंग, अश्व
आँख नेत्र, लोचन, नयन, चक्षु, दृग
आम आम्र, रसाल, सहकार, चूत
आनन्द मोद, प्रमोद, हर्ष, आमोद, सुख, उल्लास, प्रसन्नता
इन्द्र सुरपति, शक्र, पुरन्दर, वासव, देवराज, महेन्द्र
कमल सरोज, जलज, पंकज, राजीव, शतदल, सरसिज
कामदेव मदन, मन्मथ, मार, कन्दर्प, अनंग, पंचशर, स्मर
गणेश लम्बोदर, एकदन्त, मूषकवाहन, गजवदन, विनायक, गणपति
गंगा देवनदी, सुरसरित, भागीरथी, नदीश्वरी
घर निकेतन, भवन, सदन, मन्दिर, आवास, आलय, गृह, गेह
चन्द्रमा चाँद, हिमांशु, सुधांशु, विधु, सुधाकर, राकेश, शशि, चन्द्र
जल नीर, सलिल, पानी, अम्बु, वारि, पय, जीवन
यमुना सूर्यसुता, सूर्यतनया, कालिन्दी, कृष्णा, रविसुता
दुःख पीड़ा, व्यथा, कष्ट, संकट, शोक, क्लेश, वेदना, विषाद
दुर्गा चण्डिका, कालिका, कल्याणी, कामाक्षी, महागौरी, चामुण्डा
नदी सरिता, तटिनी, निर्झरिणी, तरंगिणी
पत्नी भार्या, दारा, सहधर्मिणी, गृहिणी, बहू, वधू, वामा, जोरू
हवा वायु, समीर, वात, बयार, अनिल, पवन, मरुत
पक्षी विहंग, विहग, खग, पखेरू, चिड़िया, अंडज, पतंग
पर्वत भूधर, शैल, अचल, गिरि, नग, तुंग, पहाड़, महीधर
पार्वती उमा, गौरी, शिवा, भवानी, गिरिजा, सती, शैलसुता
पुत्री सुता, बेटी, लड़की, दुहिता, तनुजा
पृथ्वी भू, भूमि, धरा, धरणी, वसुधा, अवनि, क्षमा, वसुमती
ब्रह्मा आत्मभू, स्वयंभू, चतुरानन, विधि, विधाता, लोकेश
वृक्ष तरु, हुम, पादप, विटप, पेड़, गाछ
महादेव शम्भु, पशुपति, शिव, भूतेश, गिरीश, हर, त्रिलोचन, नीलकंठ
रात निशा, रजनी, रैन, यामिनी, विभावरी, रात्रि
राजा नृप, 'भूप, महीप, नरपति, नरेश, सम्राट्
सरस्वती पद्मासना, भारती, गिरा, वाणी, शारदा, वीणापाणि, वागीश्वरी
१. अशुद्ध वाक्य - छात्रों ने पं० नेहरू को अभिनन्दन-पत्र प्रदान किया।
शुद्ध वाक्य - छात्रों ने पं० नेहरू को अभिनन्दन-पत्र समर्पित किया।
२. अशुद्ध वाक्य -उनकी सौभाग्यवती कन्या का विवाह कल होगा।
शुद्ध वाक्य - उनकी सौभाग्यकांक्षिणी कन्या का विवाह कल होगा।
३. अशुद्ध वाक्य - शोक है कि आपने मेरे पत्रों का उत्तर नहीं दिया।
शुद्ध वाक्य - खेद है कि आपने मेरे पत्रों का उत्तर नहीं दिया।
४. अशुद्ध वाक्य -उस पर आशा के बादल छा गये ।
शुद्ध वाक्य -उस पर निराशा के बादल छा गये ।
५. अशुद्ध वाक्य -जीवन और साहित्य का घोर सम्बन्ध है।
शुद्ध वाक्य -जीवन और साहित्य का घनिष्ठ सम्बन्ध है।
६. अशुद्ध वाक्य-आपका पत्र सधन्यवाद या धन्यवाद सहित प्राप्त हुआ।
शुद्ध वाक्य -आपका पत्र प्राप्त हुआ। धन्यवाद !
७. अशुद्ध वाक्य - इस समय आपकी आयु चालीस वर्ष की है।
शुद्ध वाक्य - इस समय आपकी अवस्था चालीस वर्ष की है।
८. अशुद्ध वाक्य -राम ने मोहन पर कठोर कुठाराघात किया।
शुद्ध वाक्य -राम ने मोहन पर कुठाराघात किया।
९. अशुद्ध वाक्य -वह दण्ड देने के योग्य है।
शुद्ध वाक्य -वह दण्डनीय है या वह दण्ड पाने के योग्य है।
१०.अशुद्ध वाक्यएक गाय, दो घोड़े और एक बकरी मैदान में चर रहे हैं।
शुद्ध वाक्य एक गाय, दो घोड़े और एक बकरी मैदान में चर रही हैं।
११.अशुद्ध वाक्य कृपया आप ही यह बतलाने का अनुग्रह करें।
शुद्ध वाक्य कृपया आप ही यह बताइये।
१२.अशुद्ध वाक्य तमाम देश भर में यह बात फैल गई।
शुद्ध वाक्य देशभर में यह बात फैल गई।
१३. अशुद्ध वाक्य वे सब कालचक्र के पहिए के नीचे पिस गये।
शुद्ध वाक्य वे सब कालचक्र में पिस गये।
१४. अशुद्ध वाक्य भाषण सुनने के बाद राम वापिस लौट आया।
शुद्ध वाक्य भाषण सुनने के बाद राम लौट आया।
१५. अशुद्ध वाक्य वह भी सोती नींद से जाग उठा।
शुद्ध वाक्य वह भी नींद से जाग उठा।
१६. अशुद्ध वाक्य वे लोग परस्पर एक-दूसरे को सन्देह की दृष्टि से देखते हैं।
शुद्ध वाक्य वे एक-दूसरे को सन्देह की दृष्टि से देखते हैं।
१७. अशुद्ध वाक्य बाजार में झुण्ड के झुण्ड जानवर खड़े हैं।
शुद्ध वाक्य बाजार में झुण्ड के झुण्ड जानवर हैं।
१८. अशुद्ध वाक्य आपका भवदीय
शुद्ध वाक्य भवदीय
१९. अशुद्ध वाक्य कै बजे ? चार बजे ।
शुद्ध वाक्य क्या बजा ? चार बजा।
२०. अशुद्ध वाक्य सभा में सभी वर्ग के लोग उपस्थित थे।
शुद्ध वाक्य सभा में हर वर्ग के लोग उपस्थित थे।
२१. अशुद्ध वाक्य उसे सौ रुपये जुर्माने हुए।
शुद्ध वाक्य उसे सौ रुपया जुर्माना हुआ।
२२. अशुद्ध वाक्य स्वस्ति श्री पिताजी, प्रणाम।
शुद्ध वाक्य सिद्धि श्री पिताजी, प्रणाम।
२३. अशुद्ध वाक्य सिद्धि श्री अनुज, प्रसन्न रहो।
शुद्ध वाक्य स्वस्ति श्री अनुज, प्रसन्न रहो।
२४. अशुद्ध वाक्य वह भाँग ढालता है।
शुद्ध वाक्य वह भाँग छानता है।
२५. अशुद्ध वाक्य प्रत्येक छोटी-मोटी विशेषताओं को देखना चाहिए।
शुद्ध वाक्य प्रत्येक छोटी-मोटी विशेषता को देखना चाहिए।
२६. अशुद्ध वाक्य कुछ प्रकाशक लेखकों को निराशा देते हैं।
शुद्ध वाक्य कुछ प्रकाशक लेखकों को निराश करते हैं।
२७. अशुद्ध वाक्य गुरुजी प्रश्न पूछते हैं।
शुद्ध वाक्य गुरुजी प्रश्न करते हैं।
२८. अशुद्ध वाक्य मैं आपकी भक्ति या श्रद्धा करता हूँ।
शुद्ध वाक्य मैं आप पर भक्ति या श्रद्धा रखता हूँ।
२९. अशुद्ध वाक्य यह काम आप पर निर्भर करता है।
शुद्ध वाक्य यह काम आप पर निर्भर है।
३०. अशुद्ध वाक्य वहाँ घमासान की लड़ाई हो रही है।
शुद्ध वाक्य वहाँ घमासान लड़ाई हो रही है।
३१. अशुद्ध वाक्य इन दोनों में केवल यही अन्तर है।
शुद्ध वाक्य इन दोनों में यही अन्तर है।
३२. अशुद्ध वाक्य हम तो अवश्य ही जायेंगे।
शुद्ध वाक्य हम तो अवश्य जायेंगे।
३३. अशुद्ध वाक्य पिता का उत्तरदायित्व पुत्र के ऊपर होता है।
शुद्ध वाक्य पिता का उत्तरदायित्व पुत्र पर होता है।
३४. अशुद्ध वाक्य यह तो केवल आप ही पर निर्भर है।
शुद्ध वाक्य यह तो केवल आप पर निर्भर है।
३५. अशुद्ध वाक्य उन्हें मृत्युदण्ड की सजा मिली है।
शुद्ध वाक्य उन्हें मृत्युदण्ड मिला है।
३६. अशुद्ध वाक्य वह आरोग्य हो गया।
शुद्ध वाक्य वह निरोग हो गया।
३७. अशुद्ध वाक्य निरपराधी को दण्ड देना उचित नहीं।
शुद्ध वाक्य निरपराध को दण्ड देना उचित नहीं।
३८. अशुद्ध वाक्य आज मैं प्रातःकाल के समय वहाँ गया।
शुद्ध वाक्य आज मैं प्रातःकाल वहाँ गया।
३९. अशुद्ध वाक्य वह विलाप करके रोने लगा।
शुद्ध वाक्य वह विलाप करने लगा।
४०. अशुद्ध वाक्य हिमालय में ठण्डी बर्फ जमी रहती है।
शुद्ध वाक्य हिमालय पर बर्फ जमी रहती है।
४१. अशुद्ध वाक्य उन्होंने अपनी कविता आप पढ़कर सुनाई ।
शुद्ध वाक्य उन्होंने अपनी कविता पढ़कर सुनाई।
४२. अशुद्ध वाक्य उसके बाद फिर यह हुआ।
शुद्ध वाक्य उसके बाद यह हुआ।
४३. अशुद्ध वाक्य चरखा कातना चाहिए।
शुद्ध वाक्य चरखा चलाना चाहिए।
४४. अशुद्ध वाक्य निम्न शब्दों पर ध्यान दें।
शुद्ध वाक्य निम्नलिखित शब्दों पर ध्यान दें।
४५. अशुद्ध वाक्य सारे विश्वभर में उसका नाम प्रसिद्ध है।
शुद्ध वाक्य विश्वभर में उसका नाम प्रसिद्ध है।
४६. अशुद्ध वाक्य मोती की कड़ियाँ।
शुद्ध वाक्य मोती की लड़ियाँ।
४७. अशुद्ध वाक्य गीतों की लड़ियाँ।
शुद्ध वाक्य गीतों की कड़ियाँ।
४८. अशुद्ध वाक्य हाथों की बेड़ियाँ।
शुद्ध वाक्य हाथों में हथकड़ियाँ।
४९.अशुद्ध वाक्य पैरों में हथकड़ियाँ।
शुद्ध वाक्य पैरों में बेड़ियाँ।
५०. अशुद्ध वाक्य उसने पूरी शक्ति भर काम किया।
शुद्ध वाक्य उसने शक्ति भर काम किया।
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आ आलस्य, आचार, आखेट, आभार, आशीर्वाद, आयोजन
अं, अँ अंधड़, अंगूर, अंक, अंकुश, अंगार, अँधेरा
ओ, औ ओठ, ओला, औसत, औजार
इ, ई इजलास, इन्द्रासन, इन्तजार, इलाका, ईधन
उ, ऊ उद्धार, उतार, उबटन, उफान, ऊख, ऊधम
क कटोरा, कफ, करकट, करतल, करार
का काग, काजल, काठ, काँच, कानन, कार्य, कायाकल्प
कि की कु कू किन्नर, कीचड़, कुटीर, कुमुद, कुहासा, कुआँ, कूड़ा
के को कौ केंकड़ा, केशर, कोल्हू, कोष, कोट, कोहनूर, कौतूहल, कौआ, कौशल
ख खजूर, खण्डहर, खटमल, खानपान, खुलासा, खोआ
ग गंजा, गन्धक, गगन, गज, गुलाब, गोधन
घ घट, घटाटोप, घड़ा, घन, घाटा, घोंघा, घोल
च चंगुल, चन्दन, चन्द्रमा, चन्द्रहार, चिराग, चौक
छ छन्द, छज्जा, छाता, छप्पर, छींटा, छोर, छेद
ज जमघट, जहाज, जन्तु, जत्था, जनपद, जनवासा, जाम
झ झंझावात, झकोर, झींगुर, झुकाव, झाड़, झुण्ड
ट टाट, टापू, टिकट, टिकाव, टीन, टमटम, टकुआ
ठ ठप्पा, ठहराव, ठाठ-बाट, ठीकरा, ठूंठ, ठौर, ठर्रा
ड डंका, डंडा, डण्ठल, डग, डब्बा, डमरू, डर, डोल
ढ ढंग, ढोल, ढेर, ढोंग
त तन्तु, तत्व, तम्बाकू, तालाब, तेल, तीर्थ, तेज, तरंग
थ थन, थपेड़ा, थप्पड़, थल, थान, थाक, थूक, थूकना
द दंगल, दंगा, दण्ड, दम्भ, दबाव, दमन, दर्प, दही
ध धन्धा, धन, धान, धैर्य, ध्यान, धनिया
न नमक, नक्षत्र, नग, निकास, निवेदन, नीबू
प पंचनद, पन्थ, पकवान, पनीर, पाचन, पीतल, प्रारम्भ
फ फरेब, फर्क, फल, फाग, फाटक, फागुन, फेफड़ा
ब बण्डल, बन्दरगाह, बाजा, बेलन, बाजार, बूँट, बेला
भ भँवर, भजन, भवन, भत्ता, भस्म, भौंरा, भेड़िया
म मंच, मजीरा, मवेशी, मेला, मोड़, मोती
य यन्त्र, यति, यम, यश, यातायात, यत्न
र रक्त, रत्न, रबर, रमण, रहस्य, राग, रेत
ल लंगर, लिबास, लगाव, लेख, लोप, लोक, लौंग
व वजन, वज्र, वन, वर, वरण, विष, वृत्तान्त, व्यंग्य
श शंख, शक, शतदल, शनि, शब्द, शयन
ष षडानन, षड्यन्त्र, षष्ठी, षोडश, षट्कर्म
स संकट, सम्बन्ध, साग, सिंगार, सोच, सोहर
ह हंस, हज, हक, हठधर्म, हठयोग, हार, होटल
अ अन्त्येष्टि, अकड़, अमन, अड़चन, अड़िमा
आ आँख, आँच, आग, आज्ञा, आत्मा, आयु, आराधना
इ, ई इंच, इन्द्रिय, इजाजत, इमारत, इला, ईंट, ईद
उ, ऊ उड़ान, उथल-पुथल, उषा, उलझन, उर्दू, ऊहा
ए, ऐ एकता, ऐंठ, ऐनक
ओ, औ ओट, ओस, औलाद, औसत
क कथा, कड़क, कतार, किशमिश, कील
ख खटपट, खटिया, खनक, खपत, खबर, खुदाई
ग गंगा, गजल, गिटपिट, गेरू, गुलेल, गैल, गोद
घ घटा, घटिया, घास, घूस, घृणा, घोषणा
च चमेली, चकई, चींटी, चिमनी, चौपड़, चौखट
छ छटा, छप्पर, छमछम, छवि, छानबीन, छूट, छुआछूत
ज जंग, जंजीर, जय, जड़, जरूरत, जेब, जोंक, जलन
झ झंकार, झंझट, झकझक, झाड़, झालर, झील
ट टकसाल, टपक, टाँग, टाप, टीस, टिप्पणी
ठ ठण्डक, ठाठ, ठनक, ठूंठ, ठेक, ठोकर, ठेस
ड डग, डपट, डाट, डींग, डीठ, डोर, डिबिया
ढ ढोलक, ढर्रा, ढलान
त तन्द्रा, तकदीर, तकरार, तड़प, तबीयत, तीज, तुक
थ थकान, थन, थाल, थरथर, थाह
द दवात, दलान, दीवार, दिल, दिशा, देवता, दुम
ध धान, धन, धमक, धारा, धूप, धरोहर, धाक
न नकल, नकाब, नकेल, नहर, नसीहत, नोक
प पानी, पकड़, पसन्द, पाँच, परिक्रमा, पुलिस
फ फटकार, फजियत, फसल, फाँक, फाँस, फूट
ब बन्दूक, बकवास, बरात, बर्फ, बहार, बालिका
भ भगदड़, भीख, भूख, भुजा, भेंट, भैंस, भौंह
म मटर, मटक, मंशा, मर्यादा, मीनार, मूँग, मूँछ
य यमुना, यति, यात्रा, याचना, यादगार
र रगड़, रंग, राका, राख, रसना, राह, रेल
ल लंका, लगन, लालसा, लोटपोट, लानत
व वकालत, वसीयत, विजय, विदाई, विद्या
श शंका, शरबत, शशि, शराब, शपथ, शाखा
ष षष्ठ, षडानन
स सन्तान, सम्पदा, सजावट, सरकार, सृजन, सुबह
ह हड़ताल, हंस, हाट, हार, हाल, हिचक, हेला
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सरकारी कार्यालयों में और उच्च अधिकारियों के बीच संचिकाओं (Files) पर जो टिप्पणियाँ लिखी जाती हैं वे लम्बी तो नहीं होतीं, छोटी और संक्षिप्त भी होती हैं। उनके कुछ सामान्य उदाहरण मूल अंग्रेजी में दिये गये टिप्पणों के साथ यहाँ दिये जाते हैं-
१. Seen, thanks. देख लिया, धन्यवाद ।
२. Seen and returned. देखकर लौटा दिया।
३. For information only. केवल सूचनार्थ।
४. Submitted for information. सूचनार्थ प्रस्तुत है।
५. Papers have been amalgamated. कागजपत्र मिला दिये गये हैं।
६. Kindly acknowledge receipt. कृपया पावती भेजिए।
७. The acknowledgement of the letter has been received. पत्र मिलने की सूचना भेज दी गयी है।
८. Needful has been done. जरूरी कार्यवाही कर दी गई है।
९. Draft reply is put up for approval. प्रारूप अनुमोदन के लिये प्रस्तुत है।
१०. Notes and orders at pages connection. ges 10 and 12 may be seen in this इस संबंध में पृष्ठ १० और १२ पर दिये गये आदेश और टिप्पणियाँ देख ली जाएँ।
११. Please see the preceding notes. कृपया पिछली टिप्पणियाँ देख लें।
१२. The required information is being obtained from the section and will be furnished on receipt. अपेक्षित जानकारी अनुभाग से मँगाई जा रही है और प्राप्त होने पर भेज दी जायगी।
१३. A brief of resume of the case is given in the ensuing paragraphs. इस मामले का संक्षेप में सार नीचे दिये गये अनुच्छेदों में दिया जा रहा है।
१४. A revised draft memorandum is put as desired by you. आपकी इच्छानुसार ज्ञापन का पुनरीक्षण प्रारूप प्रस्तुत है।
१५. A chronological summary of the case is placed below. इस मामले का तिथिवार सारांश नीचे दिया गया है।
१६. Chief Controller has returned the papers. मुख्य नियन्त्रक ने कागज लौटा दिये हैं।
१७. Draft has been amended accordingly. प्रारूप तदनुसार संशोधित कर दिया गया है।
१८. The proposal is self-explanatory. प्रस्ताव अपने आप में स्पष्ट है।
१९. A short history of the case, under consideration is given on pp.7-9 ante. विचाराधीन मामलों का संक्षिप्त वृत्त पृष्ठ ७-९ पर दिया गया है।
२०. No further action is craved for. आगे कोई कार्यवाही अपेक्षित नहीं है।
२१. This may please be treated as urgent.
कृपया इसे अविलम्बीय या अर्जेन्ट समझें ।
२२. The papers sent herewith. कागजपत्र इसके साथ भेजे जा रहे हैं।
२३. Ministry of Education may be consulted.
शिक्षा मंत्रालय से परामर्श किया जाए।
२४. The file in question is placed below.
संबद्ध फाइल या संचिका नीचे रखी है।
२५. We may wait the minutes of the meeting, held in the Ministry of Home Affairs on 15th June, 1996. हम १५ जून १९९६ को गृह मंत्रालय में हुई बैठक के कार्यवृत्त की प्रतीक्षा कर लें।
२६. Return of the file (papers) may kindly be expedited.
संचिका (कागज-पत्र) कृपया वापस कीजिये ।
२७. Delay in returning the file is regretted.
फाइल को लौटाने में हुई देरी के लिये खेद है।
२८. The matter is still under consideration. मामला अब भी विचाराधीन है।
२९. This may be kept pending till a decision is taken.
फाइल पर निर्णय होने तक इसे रोके रखिए।
३०. Office has no comments to offer. कार्यालय को इस पर कोई टिप्पणी नहीं करनी है।
३१. We may ask the Ministry of Finance to reconsider.
हम वित्त मंत्रालय को फिर विचार करने के लिये कहें।
३२. It will be necessary to obtain following particulars before agreeing to the proposal. प्रस्ताव पर सहमत होने से पहले नीचे लिखे ब्यौरे मँगाना जरूरी होगा।
३३. We may await further communication from Chief Minister.
हम मुख्यमंत्री के दूसरे पत्र की प्रतीक्षा कर लें।
३४. Immediate disposal of the file is requested. इस फाइल का निस्तारण शीघ्र करने का अनुरोध किया जाता है।
३५. We may ascertain the correct position from Director General in the first instance. पहले हम महानिदेशक से सही स्थिति जान लें।
३६. Delay in the submission of the case is regretted.
मामले को प्रस्तुत करने में हुई देरी के लिये खेद है।
३७. We agree with you. हम आपसे सहमत हैं।
३८. The proposal is quite in order. यह प्रस्ताव बिल्कुल नियमानुकूल है।
३९. Administrative approval may be obtained.
प्रशासनिक अनुमोदन प्राप्त किया जाय।
४०. Application may be rejected. आवेदनपत्र अस्वीकार कर दिया जाय।
४१. Casual leave applied for may be granted.
आवेदित आकस्मिक छुट्टी दी जाय।
४२. Formal approval is necessary. The same may be obtained. औपचारिक अनुमोदन आवश्यक है। उसे प्राप्त कर लिया जाय।
४३. Action may be taken as proposed. यथाप्रस्तावित कार्यवाही की जाय।
४४. Please put up a self contained note (summary). कृपया अपने में पूर्ण टिप्पण (सारांश) प्रस्तुत करें।
४५. Please circulate and file. कृपया सभी को दिखाकर फाइल कर दीजिए।
४६. Issue reminder urgently. तुरन्त अनुस्मारक भेजिए।
४७. Draft is concurred in. प्रारूप पर सहमति दी जा रही है।
४८. Office may note it carefully. कार्यालय इसे सावधानी से नोट कर ले।
४९. Ruling from Government of India should be obtained. भारत सरकार से व्यवस्था अथवा आदेश प्राप्त किया जाय।
५०. Await further report. अगले विवरण या रिपोर्ट की प्रतीक्षा कीजिए।
५१. Explanation may be called for. स्पष्टीकरण माँगा जाय।
५२. Draft may now be issued. प्रारूप अब जारी कर दिया जाय।
५३. Enquiry may be completed and its report submitted at an early date. जाँच पूरी की जाय और रिपोर्ट जल्दी प्रस्तुत की जाय।
५४. Draft reply on the lines suggested above may be put up. ऊपर दिये गये सुझावों के आधार पर उत्तर का प्रारूप तैयार किया जाय।
५५. There is no cause to modify the order already passed. जो आदेश दिया जा चुका है उसमें संशोधन का कोई कारण नहीं है।
५६. The representation has not been received through proper channel. अभिवादन विधिवत् नहीं मिला है।
५७. The bill has been verified. This is in order. May be passed for payment. बिल की जाँच-पड़ताल कर ली गई है। यह ठीक है। भुगतान के लिये पारित किया जाय।
५८. It would be necessary to fix the responsibility before the amount is written off. इस राशि को बहीखाते में डालने से पहले जिम्मेदारी निर्धारित करना आवश्यक होगा।
५९. The amount is irrecoverable. May be written off.
यह राशि वसूल होने से रही। इसे बट्टे खाते में डाल दिया जाय ।
६०. We are competent to grant permission.
अनुज्ञा या अनुमोदन देने के लिये हम सक्षम हैं।
६१. Certified that the amount of the bill has been disbursed to the proper persons.
यह प्रमाणित किया जाता है कि बिल की रकम सही व्यक्तियों को चुकाई गई है।
६२. For favourable consideration. अनुकूल विचारार्थ ।
६३. For compliance. अनुपालनार्थ ।
६४. For circulation. प्रचार के लिए।
६५. For disposal. निस्तारण के लिए।
६६. Forwarded and recommended. अग्रसारित तथा अनुशंसित ।
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नमस्ते और नमस्कार दोनों ही हिंदी में सम्मान और आदर के प्रतीक हैं, लेकिन इनमें कुछ अंतर हैं:
नमस्ते (Namaste)
नमस्ते एक पारंपरिक हिंदू अभिवादन है, जिसमें दोनों हाथों को जोड़कर और सिर को थोड़ा झुकाकर सम्मान किया जाता है। यह शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है: "नम" जिसका अर्थ है "नमस्कार" या "सम्मान", और "ते" जिसका अर्थ है "आपको"।
नमस्ते का उपयोग:
- पूजा-पाठ में देवताओं को सम्मान देने के लिए।
- बड़ों को सम्मान देने के लिए।
- पारंपरिक अवसरों पर, जैसे कि शादियों और त्योहारों में।
नमस्कार (Namaskar)
नमस्कार भी एक सम्मानजनक अभिवादन है, लेकिन यह नमस्ते की तुलना में अधिक औपचारिक है। यह शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है: "नम" जिसका अर्थ है "नमस्कार" या "सम्मान", और "स्कार" जिसका अर्थ है "सम्मान" या "प्रणाम"।
नमस्कार का उपयोग:
- औपचारिक अवसरों पर, जैसे कि बैठकों और समारोहों में।
- अधिकारियों और वरिष्ठ लोगों को सम्मान देने के लिए।
- पत्रों और ईमेल में अभिवादन के रूप में।
अंतर
नमस्ते और नमस्कार दोनों ही सम्मानजनक अभिवादन हैं, लेकिन नमस्ते अधिक पारंपरिक और धार्मिक है, जबकि नमस्कार अधिक औपचारिक और आधुनिक है। नमस्ते में दोनों हाथों को जोड़कर और सिर को झुकाकर सम्मान किया जाता है, जबकि नमस्कार में केवल मुंह से अभिवादन किया जाता है।
Roman numerals from 1 to 100:
1 - I
2 - II
3 - III
4 - IV
5 - V
6 - VI
7 - VII
8 - VIII
9 - IX
10 - X
11 - XI
12 - XII
13 - XIII
14 - XIV
15 - XV
16 - XVI
17 - XVII
18 - XVIII
19 - XIX
20 - XX
21 - XXI
22 - XXII
23 - XXIII
24 - XXIV
25 - XXV
26 - XXVI
27 - XXVII
28 - XXVIII
29 - XXIX
30 - XXX
31 - XXXI
32 - XXXII
33 - XXXIII
34 - XXXIV
35 - XXXV
36 - XXXVI
37 - XXXVII
38 - XXXVIII
39 - XXXIX
40 - XL
41 - XLI
42 - XLII
43 - XLIII
44 - XLIV
45 - XLV
46 - XLVI
47 - XLVII
48 - XLVIII
49 - XLIX
50 - L
51 - LI
52 - LII
53 - LIII
54 - LIV
55 - LV
56 - LVI
57 - LVII
58 - LVIII
59 - LIX
60 - LX
61 - LXI
62 - LXII
63 - LXIII
64 - LXIV
65 - LXV
66 - LXVI
67 - LXVII
68 - LXVIII
69 - LXIX
70 - LXX
71 - LXXI
72 - LXXII
73 - LXXIII
74 - LXXIV
75 - LXXV
76 - LXXVI
77 - LXXVII
78 - LXXVIII
79 - LXXIX
80 - LXXX
81 - LXXXI
82 - LXXXII
83 - LXXXIII
84 - LXXXIV
85 - LXXXV
86 - LXXXVI
87 - LXXXVII
88 - LXXXVIII
89 - LXXXIX
90 - XC
91 - XCI
92 - XCII
93 - XCIII
94 - XCIV
95 - XCV
96 - XCVI
97 - XCVII
98 - XCVIII
99 - XCIX
100 - C
Roman Numerals
*100-500*
- 100 - C
- 200 - CC
- 300 - CCC
- 400 - CD
- 500 - D
*600-1000*
- 600 - DC
- 700 - DCC
- 800 - DCCC
- 900 - CM
- 1000 - M
॥ तैत्तिरीयोपनिषत् ॥
॥ प्रथमः प्रश्नः ॥ (शीक्षावल्ली ॥
தைத்திரீயோபநிஷத்து
முதல் பிரச்னம் (சீக்ஷாவல்லீ)
1. (பகலுக்கும் பிராணனுக்கும் அதிஷ்டான தேவதையான ) மித்திரன் எங்களுக்கு மங்கள்கரனாக வும் (இரவுக்கும் அபானனுக்கும் அதிஷ்டான தேவ தையான ) வருணன் எங்களுக்கு மங்களகரனாகவும் (சூரியனுக்கும் கண்ணுக்கும் அதிஷ்டான தேவதை யான) அர்யமா எங்களுக்கு மங்கள கரனாகவும் இருத் தல் வேண்டும். (பலத்துக்கு அதிஷ்டான தேவதை யான ) இந்திரனும் (வாக்குக்கும் புத்திக்கும் அதிஷ் டான தேவதையான) பிருஹஸ்பதியும் எங்களுக்கு மங்களகரர்களாக இருத்தல் வேண்டும்). அனை த்தை யும் அளவிடும் அடியுடைய விஷ்ணு எங்களுக்கு மங்களகரனாக (இருக்க வேண்டும்).
அது (அந்தப் பிரம்மம்) என்னைக்காப்பாற்றட்டும். அது ஆசாரியனைக் காப்பாற்றட்டும். (மீண்டும் அதுவே பிரார்த்தனை). என்னைக் காப்பாற்றட்டும்; ஆசாரியனைக் காப்பாற்றட்டும். முவ்வகையிலும் சாந்தி நிலவுக!
உபநிஷத்தின் பெயருந்தொடர்பும் :-
வேதவியாஸரிடமி ருந்து ருக்வேதத்தைப் பைலரும், யஜுர் வேதத்தை வைசம்பாய னரும், ஸாம வேதத்தை ஜைமினியும், அதர்வ வேதத்தை ஸுமந் துவும் பெற்றுக்கொண்டதாகக் கூறுவர். இவர்கள் ஒவ்வொருவருக் கும் சிஷ்யர்கள் பலர். அவர்கள் மூலம் பல சாகைகளாக வேத நெறி பெருகி வந்தது.
வைசம்பாயனர் மிதிலாபுரியிலிருந்து கொண்டு சிஷ்யர்களைப் பயிற்சி செய்து வருகையில் அவரிடம் சேர்ந்தவர்களுள் யாஜ்ஞவல் கியரும் ஒருவர். ஒவ்வொரு நாளும் ஒவ்வொரு சிஷ்யன் ஜனக மகா ராஜனுக்குக் குருவினிடமிருந்து மந்திராக்ஷதை கொண்டுபோய்க் கொடுத்து வரவேண்டும் என்று ற்பாடாயிருந்தது. யாஜ்ஞவல் கியர் சென்ற ஒரு நாளன்று அரசன் சபையில் இல்லாதது கண்டு காத்திருக்காமல் அக்ஷதையைச் சிம்மாசனத்தில் மேல் வைத்து விட்டு வந்துவிட்டார். அரசன் வருமுன் அக்ஷதை முளைத்துச் சிம் மாசனத்தின் மேல் விதானம்போல் வளர்ந்து பரவியிருந்தது. அரசன் இதைக் கண்டு வியந்து, நிகழ்ந்ததுணர்ந்து, அன்று அக்ஷதை கொண்டு வந்த சிஷ்யனை அழைத்துவரும்படி கூறினார். கல்வி கற்கும் சமயததில் அரசன் கூப்பிட்டதை மதிக்காமல் யாஜ்ஞவல்கியர் போக மறுத்துவிட்டார்.
இக்காரணத்தாலும், முன் இரண்டொரு முறை வேறு சிஷ்யர் களை யாஜ்ஞவல்கியர் வித்தியா கர்வத்தால் அவமதித்ததாய் வைசம் பாயனர் கருதியதாலும், அவர் தனக்குரிய சிஷ்யனல்லவென்று தீர்மானித்து "என்னிடம் கற்ற வேதத்தைக் கக்கிவிடு" என்றார். உண்டசோற்றைக் கக்குவதுபோல் உண்மையாகவே கக்கிவிட்டா ரென்றும், குருவின் கட்டளையால் மற்ற சிஷ்யர்கள் அப்போது தித்திரிப்புறா வடிவங்கொண்டு யாஜ்ஞவல்கியர் கக்கியதை உட் கொண்டனர் என்றும், அதனால் அந்த வித்தையை அறிந்தவர்களா யினர் என்றுங் கதை வழங்கி வருகிறது. தித்திரிப்புறா வடிவத்தில் சிஷ் பர்கள் ஏற்றுக்கொண்ட காரணத்தால் அன்று முதல் வேதத் தின் இப்பகுதி தைத்திரீய சாகை எனவும் கிருஷ்ண யஜுர்வேதம் எனவும் வழங்கலாயிற்று. யாஜ்ஞவல்கியர் இதன்பின் விவஸ்வானை (சூரியனை) குருவாயடைந்து அத்தியயனம் செய்தது வாஜஸனேய ஸம்ஹிதை என வழங்கும் சுக்லயஜுர்வேதம்.
கிருஷ்ண யஜுர் வேதத்தில் தைத்திரீய ஆரணியகத்தின் ஏழு, எட்டு, ஒன்பதாவது பிரபாடகங்களாக அமைந்துள்ளது.
தைததிரீயோபநிஷத்து. மற்ற உபநிஷத்துக்களைவிட அதிகமாக அத்தியயனம் செய்யப்பட்டும் உபாசிக்கப்பட்டும் கர்மானுஷ்டானங் களினிடையில் உபயோகிக்கப்பட்டும் வருவதால் இவ்வுபநிஷத்துக்கு ஒரு தனிச் சிறப்புண்டு. முதல் அத்தியாயமாகிய சீக்ஷாவல்லீ, ' ஸாம்ஹிதீ' எனப்படும்.
இது பிரம்மச்சரிய ஆசிரமத்தின் முறைகளையும் கடமைகளை யும் பெருமைகளையும் விரித்துக் கூறி வேதத்தை அத்தியயனம் செய்யும் கிரமத்தையும், ஓங்கார உபாசனையின் ரஹஸ்யத்தையும், உலகில் வாழ்வாங்கு வாழ்ந்த மஹரிஷிகளின் வாழ்க்கை லக்ஷியங் களையுங் கூறுகிறது. பிரம்மானந்தவல்லீ எனப்படும் இரண்டாவது அத்தியாயம் யாஜ்ஞிகீ எனப்படும். மூன்றாவது அத்தியாயத்திற்கு ரிஷி வருணரானதால் இது ' வாருணீ' எனப்படும். இவ்விரு வல்லி -களில் சிருஷ்டிக் கிரமமும், பஞ்சகோசங்களின் அமைப்பும், படிப்படி யாக உபாசனையால் ஒப்புயர்வற்ற பிரம்ம பாவத்தை எய்துதலும், உதாரணத்தாலும் உபகதையாலும் விளக்கப்படுகின்றன.
DBHP SABHA TRICHY
EXAM RESULTS AUGUST 2024
OTHER THAN CHENNAI CITY TAMIL NADU
LOWER EXAM RESULTS
PRATHMIC
MADHYAMA
RASHTRABHASHA
&
PRAVESHIKA
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HINDI POETS AND WRITERS
The Timeless Literary Legacy of Prem Chand: A Pioneer of Indian Literature
Introduction:
In the realm of Indian literature, few names shine as brightly as Prem Chand, a luminary whose works continue to captivate readers in 2024. Born on July 31, 1880, in Lamhi, India, Prem Chand's literary journey is a testament to his boundless creativity and profound insight into the human condition. As we delve into his remarkable life and works, we celebrate the enduring legacy of Prem Chand, a true literary icon.
Early Life and Literary Beginnings:
Prem Chand's fascination with literature began at an early age, influenced by his father's love for Urdu poetry. His writing career commenced with Urdu short stories, eventually transitioning to Hindi, which became the language of choice for his subsequent works. Prem Chand's literary prowess was evident from the outset, as his stories began to garner attention for their unique blend of realism and social commentary.
Literary Contributions:
Prem Chand's literary contributions are vast and varied, with notable works like "Godan" and "Nirmala" remaining unparalleled in Indian literature. His stories masterfully wove together themes of social reform, love, and the struggles of everyday life, resonating deeply with readers. Prem Chand's writing style, characterized by simplicity and depth, has inspired generations of writers and continues to influence Indian literature in 2024.
Social Reform and Activism:
Prem Chand's commitment to social reform shone through his literature, as he tackled pressing issues like gender inequality, poverty, and social injustice. His stories served as a powerful medium for change, inspiring readers to confront and challenge societal norms. Prem Chand's activism extended beyond literature, as he actively participated in India's freedom struggle and advocated for social reform throughout his life.
Legacy and Impact:
In 2024, Prem Chand's legacy extends far beyond his literary works. He is remembered as a pioneer who paved the way for future generations of Indian writers. His influence can be seen in the works of numerous authors, who have drawn inspiration from his unique style and thematic focus. Prem Chand's impact on Indian literature is immeasurable, solidifying his position as one of the most important literary figures in Indian history.
Conclusion:
As we reflect on the remarkable life and works of Prem Chand in 2024, we honor a literary legend whose impact will be felt for generations to come. His commitment to social reform, coupled with his boundless creativity, has left an indelible mark on Indian literature. Prem Chand's timeless legacy serves as a reminder of the transformative power of literature, continuing to inspire and captivate readers in equal measure.
Unveiling the Literary Genius of
Jai Shankar Prasad:
A Pioneer of Hindi Literature
Introduction:
In the realm of Hindi literature, few names shine as brightly as Jai Shankar Prasad, a luminary whose works continue to captivate readers in 2024. Born on January 30, 1889, in Varanasi, India, Jai Shankar Prasad's literary journey is a testament to his boundless creativity and profound insight into the human condition. As we delve into his remarkable life and works, we celebrate the enduring legacy of Jai Shankar Prasad, a true literary icon.
Early Life and Literary Beginnings:
Jai Shankar Prasad's fascination with literature began at an early age, influenced by his father's love for Sanskrit and Hindi poetry. His writing career commenced with Hindi poetry, eventually transitioning to novels and plays, which became the hallmark of his literary prowess. Jai Shankar Prasad's literary contributions were evident from the outset, as his works began to garner attention for their unique blend of realism and romanticism.
Literary Contributions:
Jai Shankar Prasad's literary contributions are vast and varied, with notable works like "Kamayani" and "Skandagupta" remaining unparalleled in Hindi literature. His stories masterfully wove together themes of love, social reform, and the struggles of everyday life, resonating deeply with readers. Jai Shankar Prasad's writing style, characterized by simplicity and depth, has inspired generations of writers and continues to influence Hindi literature in 2024.
Social Reform and Activism:
Jai Shankar Prasad's commitment to social reform shone through his literature, as he tackled pressing issues like gender inequality, poverty, and social injustice. His stories served as a powerful medium for change, inspiring readers to confront and challenge societal norms. Jai Shankar Prasad's activism extended beyond literature, as he actively participated in India's freedom struggle and advocated for social reform throughout his life.
Legacy and Impact:
In 2024, Jai Shankar Prasad's legacy extends far beyond his literary works. He is remembered as a pioneer who paved the way for future generations of Hindi writers. His influence can be seen in the works of numerous authors, who have drawn inspiration from his unique style and thematic focus. Jai Shankar Prasad's impact on Hindi literature is immeasurable, solidifying his position as one of the most important literary figures in Indian history.
Conclusion:
As we reflect on the remarkable life and works of Jai Shankar Prasad in 2024, we honor a literary legend whose impact will be felt for generations to come. His commitment to social reform, coupled with his boundless creativity, has left an indelible mark on Hindi literature. Jai Shankar Prasad's timeless legacy serves as a reminder of the transformative power of literature, continuing to inspire and captivate readers in equal measure.
Unveiling the Literary Genius of
Suryakant Tripathi Nirala Ji
A Pioneer of Hindi Poetry
Introduction:
In the realm of Hindi literature, few names shine as brightly as Nirala Ji, a luminary whose works continue to captivate readers in 2024. Born on February 21, 1899, in Mahewa, India, Nirala Ji's literary journey is a testament to his boundless creativity and profound insight into the human condition. As we delve into his remarkable life and works, we celebrate the enduring legacy of Nirala Ji, a true literary icon.
Early Life and Literary Beginnings:
Nirala Ji's fascination with literature began at an early age, influenced by his father's love for Sanskrit and Hindi poetry. His writing career commenced with Hindi poetry, eventually transitioning to novels and essays, which became the hallmark of his literary prowess. Nirala Ji's literary contributions were evident from the outset, as his works began to garner attention for their unique blend of realism and romanticism.
Literary Contributions:
Nirala Ji's literary contributions are vast and varied, with notable works like "Anamika" and "Parimal" remaining unparalleled in Hindi literature. His poetry masterfully wove together themes of love, social reform, and the struggles of everyday life, resonating deeply with readers. Nirala Ji's writing style, characterized by simplicity and depth, has inspired generations of writers and continues to influence Hindi literature in 2024.
Social Reform and Activism:
Nirala Ji's commitment to social reform shone through his literature, as he tackled pressing issues like gender inequality, poverty, and social injustice. His poetry served as a powerful medium for change, inspiring readers to confront and challenge societal norms. Nirala Ji's activism extended beyond literature, as he actively participated in India's freedom struggle and advocated for social reform throughout his life.
Legacy and Impact:
In 2024, Nirala Ji's legacy extends far beyond his literary works. He is remembered as a pioneer who paved the way for future generations of Hindi writers. His influence can be seen in the works of numerous authors, who have drawn inspiration from his unique style and thematic focus. Nirala Ji's impact on Hindi literature is immeasurable, solidifying his position as one of the most important literary figures in Indian history.
Conclusion:
As we reflect on the remarkable life and works of Nirala Ji in 2024, we honor a literary legend whose impact will be felt for generations to come. His commitment to social reform, coupled with his boundless creativity, has left an indelible mark on Hindi literature. Nirala Ji's timeless legacy serves as a reminder of the transformative power of literature, continuing to inspire and captivate readers in equal measure.
PREVIOUS EXAM QUESTION PAPER AUGUST 2024
VISHARAD POORVARDH PAPER 1,2 & 3
VISHARAD UTTARARDH PAPER 1,2 & 3
PRAVEEN POORVARDH PAPER 1,2 & 3
PRAVEEN UTTARARDH PAPER 1,2,3& 4
DAKSHINA BHARAT HINDI PRACHAR SABHA, MADRAS
DAKSHINA BHARAT HINDI PRACHAR SABHA, MADRAS DIPLOMA IN SPOKEN HINDI - CORRESPONDENCE COURSE
🌹DIPLOMA IN SPOKEN HINDI - CORRESPONDENCE COURSE
1. Diploma in Spoken Hindi - (Correspondence Course) is conducted by Dakshina Bharat Hindi Prachar Sabha, Madras (Declared by Parliament as An Institution of National Importance' by act 14 of 1964).
2. This is a Correspondence Course. This Course is open to all who want to learn Spoken Hindi.
3. Age limit - Above 15 years.
4. Medium of Instructions - Tamil/English.
5. Candidate has to mention medium opted clearly in the Online Application form.
6. Duration 4 Months (January to April, May to August, September to December) - Every Year.
🌹PAYMENT DETAILS:
7. Course Fee: Rs. 4000/- including Text Book, Assignment Booklet, Contact Programs (Online) and Examinations.
8. The fees has to be paid as follows for
🍎January to April Course to be paid before December 15th
🍎May to August Course to be paid before April 15th
🍎September to December Course to be paid before August 15th
9. Fee once paid will neither be refunded nor be adjusted for any courses.
10.Interested Candidates are requested to fill up the form and pay the Fees through Online in our Website: www.dbhpscentralorg or remit the fees through cash in our Finance Department, DBHP Sabha, T.Nagar, Chennai.
11.The Screenshot or Photo of the Application and Receipt details are to be sent to the following
Email id: spokenhindionline@hotmail.com
🌹STUDY MATERIALS:
12. Text Book along with Assignment Booklets will be sent to the address given in the Application by Post:
1st set will be sent in the First week of starting of the Course.
2nd set will be sent in the First week of the Third month.
13. Text Books will have all relevant materials pertaining to Spoken Hindi - Basic Pronunciation, Words, Sentences, Situational Conversations and Classified Items etc.
14. Online Teaching Videos of each lesson will be sent privately to the mentioned e-mail id; Students can learn correct pronunciation from the Videos till batch duration.
🌹CONTACT PROGRAMS:
15. Four Online Contact Programs (Once in a Month) will be conducted during the Course.
16. These Programs will be held mostly on National Holidays or Sundays.
Timing: 4 Hours duration for each Contact Program.
17.Each Candidate will be given training to speak during the Contact Program. Lessons also will be explained in Contact Program.
18. Exercises are given at the end of each lesson, Candidates have to complete the exercises and send the written Assignment Booklet to DBHP Sabha, Madras as mentioned in the Book.
🌹ASSIGNMENT BOOKLET:
19.Assignment Booklet will be provided along with Text Books.
20.A Whatsapp Group will be created in which Students can send voice record of the lessons learnt The Trainer will listen to these voice records and send Feedback along with necessary instructions.
ONLINE EXAMINATION:
21.Examination will be conducted online at the end of the Course (Mostly on Sunday or National Holidays).
22.Total marks 100 (25 Marks for exercises in Assignment Booklet, 25 Marks for Attendance and for Contact Program, 50 Marks for Examination).
23.Pass Mark is 50 (Fifty).
24.Diploma Certificates will be issued to successful Candidates.
25.Roll number will be provided to each Candidate and it has to be mentioned in all Correspondence, Assignment Sheets etc.
26. For Administrative Clarifications and Queries regarding this Correspondence Course, Contact below mentioned Numbers only in Weekdays between 10.00 am to 5.30 pm.
27.Contact Numbers -
Landline: 044-2434 1824
Mobile: 9361417293
उदयभानुलाल बनारस के एक प्रसिद्ध वकील थे। उनकी आमदनी अच्छी थी । लेकिन वे बचत करना नहीं जानते थे । जब उनकी बडी लड़की निर्मला के विवाह का वक्त आया तब दहेज की समस्या उठ खडी हुई । बाबू भालचंद्र सिन्हा के ज्येष्ठ पुत्र भुवनमोहन सिन्हा से निर्मला की शादी की बात पक्की हो गई । सौभाग्य से सिन्हा साहब ने दहेज पर जोर नहीं दिया । इससे उदयभानुलाल को राहत मिली । निर्मला केवल पन्द्रह वर्ष की थी। इसलिए विवाह की बात सुनकर उसे भय ही ज्यादा हुआ । एक दिन उसने एक भयंकर स्वप्न देखा । वह एक नदी के किनारे पर खडी थी । एक सुंदर नाव आयी । पर मल्लाह ने निर्मला को उस पर चढ़ने नहीं दिया । फिर एक टूटी-फूटी नाव में उसे जगह मिली । नाव उलट जाती है और निर्मला पानी में डूब जाती है। तभी निर्मला की नींद टूटी ।
निर्मला के विवाह की तैयारियां शुरू हो गयीं । दहेज देने की ज़रूरत न होने से उदयभानुलाल बारातियों का स्वागत धूमधाम से करने के लिए पानी की तरह रुपए खर्च करने लगे । यह बात उनकी पत्नी कल्याणी को पसंद नहीं आयी । इस कारण से पति- पत्नी के बीच में जोरदार वाद-विवाद चला। कल्याणी ने मायके चले जाने की धमकी दी। पत्नी के कठोर वचन से दुखित होकर उदयभानुलाल ने उसे एक सबक सिखाना चाहा। नदी के किनारे पहुंचकर, वहां कुरता आदि छोडकर उन्होंने किसी अन्य शहर में कुछ दिनों के लिए चले जाने का निश्चय किया । लोग समझेंगे कि वे नदी में डूब गए । तब पत्नी की घमंड दूर हो जायेगी। उद्यभानुलाल आधी रात को नदी की ओर चल पडे । एक बदमाश ने, जो उनका पुराना दुश्मन था, उन पर लाठी चलाकर मार गिरा दिया ।
अब निर्मला के विवाह की जिम्मेदारी कल्याणी पर आ पडी । उसने पुरोहित मोटेराम के द्वारा सिन्हा को पत्र भेजा । वर्तमान हालत को देखकर साधारण ढंग से शादी के लिए स्वीकृति देने की प्रार्थना की । सिन्हा असल में लालची थे । वे उद्यभानुलाल के स्वभाव से परिचित थे । उनका विचार था कि दहेज का इनकार करने पर उससे भी ज्यादा रकम मिल जायेगी । उदयभानुलाल की मृत्यु की खबर सुनकर उनका विचार बदल गया । उनकी स्त्री रंगील बाई को कल्याणी के प्रति सहानुभूति थी । लेकिन पति की इच्छा के विरुद्ध वह कुछ नहीं कर सकी। वेटा भुवनमोहन भी बडा लालची था । वह दहेज के रूप में एक मोटी रकम मांगता था चाहे कन्या में कोई भी ऐब हो ।
मोटेराम निर्मला के लिए अन्य वरों की खोज करने लगे । अगर लड़का कुलीन या शिक्षित या नौकरी में हो तो दहेज अवश्य मांगता था । आखिर मन मारकर कल्याणी ने निर्मला के लिए लगभग चालीस साल के वकील तोताराम को वर के रूप में चुन लिया । वे काफ़ी पैसेवाले थे । उन्होंने दहेज की मांग भी नहीं की।
निर्मला का विवाह तोताराम से हो गया । उनके तीन लड़के थे मंसाराम, जियाराम, सियाराम । मंसाराम सोलह बरस का था । वकील की विधवा बहिन रुक्मिणी स्थाई रूप से उसी घर में रहती थी । तोताराम निर्मला को खुश रखने के लिए सब तरह के प्रयत्न करते थे । अपनी कमाई उसीके हाथ में देते थे । लेकिन निर्मला उनसे प्रेम नहीं कर सकी; उनका आदर ही कर सकी । रुक्मिणी बात-बात में निर्मला की आलोचना और निन्दा करती थी । लड़कों को निर्मला के विरुद्ध उकसाती थी । एक बार निर्मला ने तोताराम से शिकायत की तो उन्होंने सियाराम को पीट दिया । -
निर्मला समझ गयी कि अब अपने भाग्य पर रोने से कोई लाभ नहीं है । अतः वह बच्चों के पालन-पोषण में सारा समय बिताने लगी । मंसाराम से बातें करते हुए उसे तृप्ति मिल जाती थी । निर्मला पर प्रभाव डालने के लिए तोताराम रोज अपने साहसपूर्ण कार्यों का वर्णन करने लगे जो असल में झूठ थे। एक दिन उन्होंने बताया कि घर आते समय तलवार सहित तीन डाकू आ गए और उन्होंने अपनी छडी से उनको भगा दिया । तभी रुक्मिणी आकर बोली कि कमरे में एक सांप घुस गया है । तुरंत तोताराम भयभीत होकर घर से बाहर निकल गए । निर्मला समझ गयी कि मुंशी जी क्या चाहते हैं। उसने पत्नी के रूप में अपने को कर्तव्य पा मिटा देने का निश्चय किया ।
निर्मला अब सज-धजकर रहने और पति से हंसकर बातें करने लगी । लेकिन जब मुंशी जी को मालूम हुआ कि वह मंसाराम से अंग्रेज़ी सीख रही है तब वे सोचने लगे कि शायद इसीलिए आजकल निर्मला प्रसन्न दीखती है । उनके मन में शंका पैदा हो गयी । उनको एक उपाय सूझा । मंसाराम पर यह आक्षेप लगाया कि वह आवारा घूमता है । इसलिए वह स्कूल में ही रहा करे। रुक्मिणी ने सोचा कि निर्मला ने मंसाराम की शिकायत की होगी। वह निर्मला से झगड़ा करने लगी । निर्मला ने तोताराम से अपना निर्णय बदलने को कहा । मुंशी जी का हृदय और भी शंकित हो गया ।
मंसाराम दुखी होकर सारा दिन घर पर ही रहने लगा । वह बहुत कमजोर भी हो गया । मुंशी जी की शंका जरा कम हुई । एक दिन मंसाराम अपने कमरे में बैठे रो रहा था । मुंशी जी ने उसे सांत्वना देते हुए सारा दोष निर्मला पर मढ़ दिया । निष्कपट बालक उस पर विश्वास करके अपनी विमाता से नफ़रत करने लगा । निर्मला भी अपने पति के शक्की स्वभाव को समझ गयी । उसने मंसाराम से बोलना भी बंद कर दिया।
मंसाराम को गहरा दुख हुआ कि निर्मला ने उसके पिताजी से उसकी शिकायत की थी। वह अपने को अनाथ समझकर कमरे में ही पडा रहता था । एक रात को वह भोजन करने के लिए भी नहीं उठा । निर्मला तडप उठी । मुंशी जी बाहर गये हुए थे । निर्मला मंसाराम के कमरे में जाकर उसे प्यार से समझाने लगी। उसी वक्त तोताराम आ गए । तुरंत निर्मला कठोर स्वर में बोलने लगी और मंसाराम की शिकायत करने लगी । मंसाराम इस भाव-परिवर्तन को नहीं समझ सका । निर्मला के व्यवहार से उसे वेदना हुई । अगले दिन वह हेडमास्टर से मिलकर हास्टल में रहने का प्रबंध कर आया । निर्मला से कहे बिना वह अपना सामान लेकर चला गया ।
निर्मला ने सोचा कि छुट्टी के दिन मंसाराम घर आएगा । पर वह नहीं आया । मंसाराम की आत्म पीडा का अनुमान कर उसे अपार दुख हुआ । एक दिन उसे मालूम हुआ कि मंसाराम को बुखार हो गया है। वह मुंशी जी से प्रार्थना करने लगी कि वे मंसाराम को हास्टल से घर लाएं ताकि उसकी सेवा ठीक तरह से हो सके । यह सुनकर मुंशी जी का संदेह फिर ज्यादा हो गया ।
मंसाराम कई दिनों तक गहरी चिन्ता में डूबा रहा । उसे पढने में बिलकुल जी नहीं लगा । जियाराम ने आकर घर की हालत बतायी । यह भी कहा कि पिताजी के कारण ही निर्मला को कठोर व्यवहार का स्वांग करना पडा । इस विषय पर मंसाराम गहराई से सोचने लगा । तब अचानक वह समझ गया कि पिता जी के मन में निर्मला और उसको लेकर संदेह पैदा हुआ है। वह इस अपमान को सह नहीं सका । उसके लिए जीवन भार-स्वरूप हो गया। गहरी चिन्ता के कारण उसे जोर से बुखार हो गया । वह स्कूल के डाक्टर के पास गया । उनसे बातें करते हुए उसे एक ज़हरीली दवा के बारे में जानकारी मिली जिसे पीते ही दर्द के बिना मनुष्य मर जा सकता है । तुरंत वह खुश हो गया । थियेटर देखने गया । लौटकर हास्टल में शरारतें कीं । अगले दिन ज्वर की तीव्रता से वह बेहोश हो गया । तोताराम बुलाये गये । स्कूल के अध्यक्ष ने मंसाराम को घर ले जाने को कहा । अपने संदेह के कारण मुंशी जी उसे घर ले जाने को तैयार नहीं थे । इसे समझकर मंसाराम ने भी घर जाने से इनकार कर दिया । उसे अस्पताल में दाखिल कर दिया गया ।
यह जानकर निर्मला सिहर उठी । लेकिन मुंशी जी के सामने उसे अपने भावों को छिपाना पड़ा। वह खूब श्रृंगार करके सहास वदन से उनसे मिलती-बोलती थी । अस्पताल में मंसाराम की हालत चिन्ताजनक हो गई ।
तीन दिन गुज़र गये । मुंशी जी घर न आए । चौथे दिन निर्मला को मालूम हुआ कि ताजा खून दिये जाने पर ही मंसाराम बच सकता है। यह सुनते ही निर्मला ने तुरंत अस्पताल जाने और अपना खून देने का निश्चय कर लिया । उसने ऐसी हालत में मुंशी मंसाराम कई दिनों तक गहरी चिन्ता में डूबा रहा । उसे पढने में बिलकुल जी नहीं लगा । जियाराम ने आकर घर की हालत बतायी । यह भी कहा कि पिताजी के कारण ही निर्मला को कठोर व्यवहार का स्वांग करना पडा । इस विषय पर मंसाराम जी से डरना या उनकी शंका की परवाह करना उचित नहीं समझा। यह देखकर रुक्मिणी को पहली वार निर्मला पर दया आयी ।
निर्मला को देखते ही मंसाराम चौंककर उठ बैठा । मुंशी जी निर्मला को कठोर शब्दों से डांटने लगे । मंसाराम निर्मला के पैरों पर गिरकर रोते हुए बोला - "अम्मा जी, मैं अगले जन्म में आपका पुत्र बनना चाहूंगा । आपकी उम्र मुझसे ज्यादा न होने पर भी मैंने हमेशा आपको माता की दृष्टि से ही देखा ।" जब मुंशी जी ने सुना कि निर्मला खून देने आयी है तब उनकी सारी शंका दूर हो गयी और निर्मला के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हुई ।
डाक्टर निर्मला की देह से खून निकाल रहे थे । तभी मंसाराम का देहांत हो गया । मुंशी जी को अपना भयंकर अपराध महसूस हुआ। उनका जीवन भारस्वरूप हो गया । कचहरी का काम करने में दिल नहीं लगा । उनकी तबीयत खराब होने लगी ।
मुंशी जी और उस डाक्टर में दोस्ती हो गयी जिसने मंसाराम की चिकित्सा की थी । डाक्टर की पत्नी सुधा और निर्मला सहेलियां बन गयीं । निर्मला अकसर सुधा से मिलने उसके घर जाने लगी । एक बार उसने सुधा को अपने अतीत का सारा हाल सुनाया । सुधा समझ गयी कि उसका पति ही वह वर था जिसने दहेज के अभाव में निर्मला से शादी करने से इनकार किया था । उसने अपने पति की तीव्र आलोचना की । पूछने पर उसने अपने पति से बताया कि निर्मला की एक अविवाहित बहिन है ।
तीन बातें एकसाथ हुई। निर्मला की कन्या ने जन्म लिया। उसकी बहिन कृष्णा का विवाह तय हुआ । मुंशी जी का मकान नीलाम हो गया । वच्ची का नाम आशा रखा गया (डाक्टर (भुवनमोहन सिन्हा) ने निर्मला के प्रति अपने अपराध के प्रायश्चित्त के रूप में अपने भाई का विवाह कृष्णा से दहेज के बिना तय करा दिया। यह वात निर्मला को मालूम नहीं थी । सुधा ने निर्मला से छिपाकर उसकी मां को विवाह के लिए रुपए भी भेजे थे।
ये सारी बातें निर्मला को विवाह के समय ही मालूम हुई । वह डा. सिन्हा के प्रायश्चित्त से प्रभावित हुई । विवाह के दिन उसने डाक्टर से अपनी कृतज्ञता प्रकट कर दी । आगे कुछ समय के लिए निर्मला मायके में ही ठहर गई ।
इधर जियाराम का चरित्र बदलने लगा । वह बदमाश हो गया । वह बात-बात पर अपने पिताजी से झगडा करने लगा। यहां तक उसने कह डाला कि मंसाराम को आप ही ने मार डाला । उनको बाजार में पिटवा देने की धमकी दी । एक दिन डा. सिन्हा ने उसे खूब समझाया तो वह पछताने लगा । उसने निश्चय किया कि आगे वह पिताजी की बात मानेगा । परंतु डाक्टर से मिलकर जब वह घर आया तब आधी रात हो चुकी थी। मुंशी जी उस पर व्यंग्य करने लगे । जियाराम का जागा हुआ सद्भाव फिर विलीन हो गया ।
निर्मला बच्ची के साथ घर वापस आयी । उसी दिन बच्ची के लिए मिठाई खरीदने के संबंध में बाप-बेटे में झगडा हो गया । निर्मला ने जियाराम को डांटा । मुंशी जी ने जियाराम को पीटने के लिए हाथ उठाया । लेकिन निर्मला पर थप्पड पड़ा । जियाराम पिताजी को धमकी देकर बाहर चला गया । निर्मला को भविष्य की चिन्ता सताने लगी । उसने सोचा कि उसके पास जो गहने हैं वे ही भविष्य में काम आएंगे ।
उस रात को अचानक उसकी नींद खुली । उसने देखा कि जियाराम की आकृतिवाला कोई उसके कमरे से बाहर जा रहा है। अगले दिन वह सुधा के घर जाने की तैयारी कर रही थी। तभी उसे मालूम हुआ कि उसके गहनों की संदूक गायब है । उसे रातवाली घटना याद आयी । जियाराम से पूछताछ करने पर उसने कह दिया कि वह घर पर नहीं था । वकील साहब को मालूम होने पर थाने के लिए चल दिये । निर्मला को जियाराम पर संदेह था । परन्तु विमाता होने के कारण उसे चुप रहना पडा । इसलिए वह मुंशी जी को रोक न सकी । थानेदार ने घर आकर और जांच करके बताया कि यह घर के आदमी का ही काम है। कुछ दिनों में माल बरामद हो गया । तभी मुंशी जी को असली बात मालूम हुई। जियाराम को कैद होने से बचाने के लिए थानेदार को पांच सौ रुपये देने पडे । मुंशी जी घर आये तो पता चला कि जियाराम ने आत्महत्या कर ली ।
गहनों की चोरी हो जाने के बाद निर्मला ने सब खर्च कम कर दिया। उसका स्वभाव भी बदल गया। वह कर्कशा हो गयी। पैसे बचाने के लिए वह नौकरानी के बदले सियाराम को ही बार-बार बाज़ार दौड़ाती थी। वह एक दिन जो घी लाया उसे खराब बताकर लौटा देने को कह दिया । दूकानदार वापस लेने के लिए तैयार न हुआ। वहां बैठे एक साधु को सियाराम पर दया आयी । उनके कहने पर बनिये ने अच्छा घी दिया । साधु को सियाराम के घर की हालत मालूम हुई । जब वे चलने लगे तब सियाराम भी उनके साथ हो लिया । साधु ने बताया कि वे भी विमाता के अत्याचार से पीडित थे । इसलिए घर छोड़कर भाग गये । एक साधु के शिष्य बनकर योगविद्या सीख ली । वे उसकी सहायता से अपनी मृत मां के दर्शन कर लेते हैं। साधु की बातों से सियाराम प्रभावित हुआ और अपने घर की ओर चला। असल में वह बाबा जी एक धूर्त था और लड़कों को भगा ले जानेवाला था ।
सियाराम घर लौटा तो निर्मला ने लकडी के लिए जाने को कहा। वह इनकार करके बाहर चला गया । घर के काम अधिक होने के कारण वह ठीक तरह से स्कूल न जा पाता था । उस दिन भी वह स्कूल न जाकर एक पेड के नीचे बैठ गया। उसे भूख सता रही थी । उसे घर लौटने की इच्छा नहीं हुई । बाबा जी से मिलने के लिए उत्सुक होकर उन्हें ढूंढने लगा । सहसा वे रास्ते में मिल पडे। पता चला कि वे उसी दिन हरिद्वार जा रहे हैं। सियाराम ने अपने को भी ले चलने की प्रार्थना की। साधु ने मान लिया । वेचारा सियाराम जान न सका कि वह बाबा जी के जाल में फंस गया है।
मुंशी जी वडी थकावट के साथ शामको घर आये । उन्हें सारा दिन भोजन नहीं मिला था । उनके पास मुकदमे आते नहीं थे या आने पर हार जाते थे । तब वे किसीसे उधार लेकर निर्मला के हाथ देते थे । उस दिन उनको मालूम हुआ कि सियाराम ने कुछ भी नहीं खाया और उसे पैसे भी नहीं दिये गये । उनको निर्मला पर पहली बार क्रोध आया । बहुत रात बीतने पर भी सिया नहीं आया तो मुंशी जी घबराये । बाहर जाकर सब जगह ढूंढने पर भी सिया का पता नहीं चला । अगले दिन भी सुबह से आधी रात तक ढूंढकर वे हार गये ।
तीसरे दिन शामको मुंशी जी ने निर्मला से पूछा कि क्या उसके पास रुपये हैं । निर्मला झूठ बोली कि उसके पास नहीं है । रात को मुंशी जी अन्य शहरों में सियाराम को ढूंढने के लिए निकल पड़े । निर्मला को ऐसा जान पड़ा कि उनसे फिर भेंट न होगी ।
एक महीना पूरा हुआ । न तो मुंशी जी लौटे और न उनका कोई खत मिला । निर्मला के पास जो रुपए थे वे कम होते जा रहे थे । केवल सुधा के यहां उसे थोड़ी मानसिक शांति मिलती थी । एक दिन सबेरे वह सुधा के यहां पहुंची । सुधा नदी-स्नान करने गयी हुई थी। निर्मला सुधा के कमरे में जा बैठी । डा. सिन्हा ऐनक ढूंढते हुए उस कमरे में आये । निर्मला को एकांत में पाकर उनका मन चंचल हो उठा। वे उससे प्रेम की याचना करने लगे ।
तुरंत वह कमरे से भागकर दरवाजे पर पहुंची । तब सुधा को तांगे से उतरते देखा । उसके लिये रुके बिना निर्मला तेजी से अपने घर की ओर चली गयी। सुधा कुछ समझ नहीं सकी। उसने डाक्टर से पूछा । उन्होंने स्पष्ट उत्तर नहीं दिया । सुधा तुरंत निर्मला के यहां पहुंची । निर्मला चारपाई पर पडी रो रही थी। उसने स्पष्ट रूप से तो अपने रोने का कारण नहीं बताया । लेकिन बुद्धिमति सुधा समझ गयी कि डाक्टर ने दुर्व्यहार किया है । अत्यंत क्रोधित होकर वह निकल पड़ी । निर्मला उसे रोक न सकी ।
उसे ज्वर चढ़ आया । दूसरे दिन उसे रुक्मिणी के ज़रिये मालूम हुआ कि डा. सिन्हा की मृत्यु हो चुकी थी । निर्मला को अपार वेदना हुई कि उसीके कारण डाक्टर का अंत असमय हो गया । जब निर्मला डाक्टर के यहां पहुंची तब तक लाश उठ चुकी थी । सुधा ने बताया कि उसने घर लौटकर पति की कड़ी आलोचना कर दी । इससे क्षुब्ध होकर डाक्टर ने अपना अंत कर लिया ।
एक महीना गुजर गया । सुधा वह शहर छोडकर अपने देवर के साथ चली जा चुकी थी । निर्मला के जीवन में सूनापन छा गया । अब रोना ही एक काम रह गया । उसका स्वास्थ्य अत्यंत खराब हो गया । वह समझ गयी कि उसके जीवन का अंत निकट आ गया है । उसने रुक्मिणी से माफ़ी मांगी कि वह उसकी उचित सेवा न कर सकी । रुक्मिणी ने भी उससे अपने कपटपूर्ण व्यवहार के लिए क्षमा याचना की । निर्मला ने बच्ची को रुक्मिणी के हाथ सौंप दिया ।
फिर तीन दिन तक वह रोये चली जाती थी । वह न किसीसे बोलती थी, न किसीकी ओर देखती थी और न किसी का कुछ सुनती थी । चौथे दिन संध्या समय निर्मला ने अंतिम सांस ली । मुहल्ले के लोग जमा हो गये । लाश बाहर निकाली गयी । यह प्रश्न उठा कि कौन दाह करेगा । लोग इसी चिन्ता में थे कि सहसा एक बूढ़ा पथिक आकर खड़ा हो गया । वह मुंशी तोताराम थे ।
हिन्दी साहित्य के इतिहास का संक्षिप्त परिचय यहाँ भूमिका के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। हिन्दी गद्य-साहित्य के विकास को जानने से पूर्व ऐतिहासिक काल-विभाजन और साहित्य की प्रवृत्तियों का अवलोकन अप्रासंगिक नहीं होगा।
🔴 आदिकालः
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार हिन्दी साहित्य के इतिहास के प्रारंभिक काल आदिकाल अथवा वीरगाथा-काल की अवधि, संवत् 1050 से लेकर 1375 तक मानी जाती है। 'वीरगाथा' शब्द से ही उस काल- गत काव्य की प्रमुख विशेषता का बोध हो जाता है। यद्यपि भक्ति, श्रृंगार, सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर भी कविगण अपनी रचनाएँ करते रहे, फिर भी साहित्य के समग्र रूप का आकलन करते समय युद्ध- साहित्य, युद्ध के वर्णन की प्रधानता के कारण यह नामकरण सर्वमान्य रहा। इस काल की रचनाओं में विजयपालरासो, हम्मीररासो, कीर्तिलता और कीर्तिपताका को अपभ्रंश-साहित्य मानते हुए गिनती में नहीं लिया गया। खुमानरासो, बीसलदेवरासो, पृथ्वीराजरासो, जयचंद प्रकाश, जयमयंक जसचंद्रिका, परमालरासो, खुसरो की पहेलियाँ और विद्यापति की पदावली प्रमुख मानी जाती हैं। इसी युग के अंतर्गत नाथ-सिद्ध-साहित्य भी समाविष्ट है। जैन मुनियों का विशाल धार्मिक साहित्य भी उपलब्ध है। कवि अब्दुर रहमान का 'संदेश रासक' इसी युग की अत्यंत रमणीय कृति है। विषय-वस्तु की दृष्टि से स्पष्ट है कि इस कालखण्ड में वीरगाथात्मक रचनाएँ ही नहीं, बल्कि विभिन्न रसों की साहित्यिक कृतियाँ भी समाविष्ट की गई हैं।
संवत् 1375 से लेकर 1700 तक का समय भक्ति काल माना जाता है। नामकरण की समस्या ने इस कालखण्ड को भी अछूता नहीं छोड़ा है। भक्ति-काल, जो कि पूर्व मध्यकाल भी कहलाता है, के दौरान भक्ति की भावधारा ने ही साहित्य को समृद्ध बनाया है; यों कहें तो अत्युक्ति नहीं होगी। इस काल में भक्ति की भी विभिन्न शाखाएँ और धारणाएँ प्रचलन में रहीं। पं. हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार भक्ति- आन्दोलन भारतीय चिंतन का ही स्वाभाविक विकास है। नाथ-सिद्धों की साधना, अवतारवाद, लीलावाद आदि प्रवृत्तियाँ दक्षिण भारत से आकर, इस धारा में घुलमिल गयीं। यह आन्दोलन और साहित्य लोकोन्मुख और मानवीय करुणा के महान् आदर्श से युक्त था। भक्ति की ज्ञानाश्रयी और प्रेमाश्रयी रूपी दो शाखाएँ निकल पड़ी। हिन्दु-मुस्लिम संप्रदाय के समन्वय की प्रवृत्ति को लेकर ज्ञानाश्रयी शाखा का कबीर ने नेतृत्व किया तो सूफ़ी संप्रदाय के अनुयायी प्रेमाश्रयी पंथ पर चल पड़े।
👉 निर्गुण धाराः -
भक्ति-काल के प्रारंभ की संत काव्य-परंपरा अत्यंत महत्व रखती है। कबीरदास के पहले भी यद्यपि निर्गुणोपासक भक्त संत कवि के रूप में प्रसिद्ध रहे तथापि कबीर के समय से ही इस काव्य धारा को स्थायित्व प्राप्त हुआ। संत काव्य की अनेक विशेषताएँ हैं।
कवि निराकार ब्रह्म का वर्णन करते हैं, उनके साथ साक्षात्कार और मिलन की अनुभूति प्रकट करते हैं। निर्गुण साहित्य में अंतर्निहित रहस्यवाद इसी अनुभूति की उपज है।
इस धारा के कवि समाज-सुधारक भी थे। जाति-भेद, वर्ण-भेद, शोषण आदि का खंडन इनके काव्य के माध्यम से लक्षित होता है। गुरु की महिमा, वाह्याडंबर एवं रूढ़िवाद का खंडन, इनकी अन्य विशेषताएँ हैं।
संत रैदास, धरमदास, दादूदयाल, सुंदरदास, मलूकदास आदि अन्य प्रमुख कवि हैं। ब्रजभाषा और खड़ीबोली दोनों में इस पंथ के कवि लिखा करते थे। इन कवियों की भाषा आम तौर पर सधुक्कड़ी मानी जाती है।
उदाहरण के लिए कबीरदास का दोहा इस प्रकार है-
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोइ।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सु पंडित होइ ।।
मलूकदास की रचना का उदाहरण देखें:-
अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम।
दास मलूका कहि गये, सबके दाता राम।।
गुरुनानक जैसे पंजाब के संत कवि ने भी इसी पंथ को अपनाया था।
प्रेमाख्यान परंपरा के अंतर्गत दो प्रकार के प्रेमाख्यान मिल रहे हैं। आध्यात्मिक प्रेमपरक काव्य और विशुद्ध लौकिक प्रेमगाथा काव्य। मुसलमान सूफी कवियों के द्वारा तथा हिन्दू भक्त कवियों के द्वारा विरचित प्रेमाख्यानों में कुतुबन का "मृगावती", मंझन का "मधुमालती" जैसे काव्य प्रसिद्ध हैं। मलिक मुहम्मद जायसी, जो प्रसिद्ध सूफी संत थे, के पद्मावत काव्य ने हिन्दी प्रेमकाव्य परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया है। सूफी कवियों की रचनाएँ प्रायः कल्पना पर आधारित हुआ करती थीं, पर जायसी ने कल्पना के साथ-साथ इतिहास का भी समावेश किया।
सूफ़ी शब्द की व्युत्पत्ति के संबंध में विद्वानों में मतभेद हैं। ज्ञानी के अर्थ में प्रचलित यूनानी शब्द सूफ़ी से संबंध जोड़ा जाता है। दूसरी राय के अनुसार सूफ़ - अर्थात् पवित्रता के आधार पर परमात्मा से जुड़कर, सादा और पवित्र जीवन जीनेवाले सूफी संत कहलाये।
👉 सगुणधारा
सगुण भक्तिधारा के अंतर्गत रामभक्ति और कृष्णभक्ति के नाम से दो शाखाएँ प्रचलन में आयीं। रामचरितमानस और अन्य विशिष्ट कृतियों के रचयिता के रूप में गोस्वामी तुलसीदास ने इस शाखा का नेतृत्व किया। कृष्णभक्ति शाखा को वल्लभाचार्य ने और उनके शिष्यों, जिन्हें "अष्टछाप" के नाम से जाना जाता है- ने अपने साहित्य से पुष्ट किया।
👉 रामभक्ति शाखा
रामभक्ति शाखां के श्रेष्ठ कवि हैं गोस्वामी तुलसीदास। उन्होंने रामचरितमानस के माध्यम से हिन्दी को प्रौढ़तम साहित्य दिया है। रामचरितमानस के अलावा आपके "कवितावली" रामलीला नहछु, वरवै रामायण, जानकी मंगल, पार्वती मंगल, गीतावली, वैराग्य सन्दीपनी, कृष्ण गीतावली, रामाज्ञा प्रश्न, दोहावली और विनय पत्रिका आदि ग्रंथ प्रामाणिक माने गये हैं।
नाभादास, प्राणचन्द्र चौहान, हृदयराम आदि रामभक्ति शाखा के अन्य कवि हैं।
👉 कृष्णभक्ति शाखा
कृष्णभक्ति शाखा के सबसे प्रसिद्ध कवि सूरदास हुए। सूरसागर, सूर-सारावली और साहित्यलहरी इनकी महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं। हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में "हमारे जाने हुए साहित्य में इतनी तत्परता, मनोहारिता और सरलता के साथ लिखी हुई बाललीला अलभ्य है। बाल लीला की प्रत्येक चेष्टा के चित्रण में कवि कमाल की होशियारी और सूक्ष्म निरीक्षण का परिचय देता है। न उसे शब्दों की कमी है, न अलंकारों की, न भावों की, न भाषा की।"
मीराबाई के अलावा घनानन्द और रसखान जैसे मुसलमान कवियों ने भी कृष्णभक्ति साहित्य को अपना योगदान दिया है। सूर, तुलसी, मीराबाई जैसे महान् भक्त कवियों के साहित्य की उत्कृष्टता और विलक्षणता के कारण भक्ति काल को "स्वर्ण काल" भी कहा गया है।
👉 रीतिकाल:-
संवत् 1700 से 1900 तक का समय रीतिकाल के नाम से जाना जाता है। रीतिकाल के साहित्य में श्रृंगार रस की प्रधानता है। रीतिकाल के कवि काव्य को ही सब कुछ मानते थे। काव्य के बाह्य रूप को सँवारने में अपनी शक्ति लगाते थे। कविगण अपने अधिक से अधिक श्रृंगारपूर्ण काव्यों द्वारा अपने आश्रयदाताओं का मनोरंजन करने लगे।
पहले लक्ष्य-ग्रन्थ लिखे गये और बाद लक्षण ग्रंथ इस प्रकार से रीति ग्रंथों की रचना इस कालखण्ड की विशेषता रही।
काव्य-शास्त्र के अनेक संप्रदाय बने। भरतमुनि का रस संप्रदाय, कुन्तल का वक्रोक्ति संप्रदाय, भामह, दण्डी और रुद्रट का अलंकार सम्प्रदाय, बामन का रीति-सम्प्रदाय और आनन्द वर्द्धन का ध्वनि संप्रदाय प्रमुख हैं। साहित्य शास्त्र का विधिवत् विवेचन केशवदास ने प्रारंभ किया।
लौकिक शृंगारिकता, लक्षण ग्रन्थों का निर्माण, अलंकारिकता, ब्रजभाषा की प्रमुखता, मुक्तक-काव्य शैली की प्रधानता, भक्ति और नीति साहित्य, प्रकृति का उद्दीपन रूप नारी-वर्णन इस काल के साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ मानी जाती हैं।
इस काल में केशवदास, बिहारी, चिन्तामणित्रिपाठी, मतिराम, ललित ललाम आदि प्रमुख कवि हुए हैं।
आधुनिक हिन्दी साहित्य का प्रारम्भ सन् 1868 ई0 से मानना उचित होगा। आधुनिक हिन्दी के जनक भारतेन्दु ने अपने अद्भुत प्रतिभासम्पन्न व्यक्तित्व से हिन्दी-साहित्य का नेतृत्व अपने हाथों में लिया था। इसके पूर्व का 70-80 वर्षों का समय आधुनिक हिन्दी साहित्य के मुख्य माध्यम, अर्थात् खड़ी बोली के, साहित्य-क्षेत्र में अधिकार जमाने का समय था; वह भूमिका-स्वरूप था।
इतिहासज्ञों ने आधुनिक हिन्दी-साहित्य के सन् 1868 से लेकर आज तक के समय को चार चरणों में विभक्त किया है। सन् 1868 से 1893 ई० तक के प्रथम चरण को भारतेन्दु-युग भी कहते है। सन् 1896 से 1918 तक का समय द्वितीय चरण अथवा द्विवेदी-युग के नाम से प्रसिद्ध है। सन् 1918 से 1936 तक को तृतीय चरण या छायावाद-युग के नाम से अभिहित करते है। सन् 1936 से लेकर आज तक का समय चतुर्थ उत्थान अथवा प्रगतिशील युग के नाम से चल रहा है। प्रत्येक उत्थान की साहित्यिक, कलात्मक और भाषा-सम्बन्धी उपलब्धियों का मूल्यांकन संक्षेप में निम्न प्रकार से किया जा सकता है।
⭕ प्रथम चरणः भारतेन्दु-युगः-
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने जब हिन्दी-साहित्य-क्षेत्र में पदार्पण किया, उस समय तक यद्यपि खड़ी बोली, गद्य के माध्यम के रूप में, अपनी श्रेष्ठता प्रतिपादित कर चुकी थी तो भी राजनैतिक एवं सामाजिक विचार- भेदों के कारण हिन्दी के मार्ग में रोड़े बहुत थे और उर्दू का प्रभाव भी फैलता जा रहा था। परन्तु "भारतेन्दु" के उदय के साथ "सितारेहिन्द" की आभा मन्द हो चली। प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट, जगमोहन सिंह, श्रीनिवासदास, बदरीनारायण चौधरी, राधाकृष्णदास, कार्तिकप्रसाद खत्री, रामकृष्ण वर्मा आदि तेजस्वी व्यक्तित्ववाले लेखकों के सामर्थ्यवान् गुट का सक्रिय सहयोग प्राप्त कर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने हिन्दी के मार्ग की सारी बाधाएँ दूर कर उसका भविष्य सदा के लिए निष्कंटक बना दिया। खड़ी बोली हिन्दी में गद्य रचना का अटूट क्रम चल निकला। भारतेन्दु-युग की भाषा- सम्बन्धी यह उपलब्धि हिन्दी के लोगों द्वारा सदैव स्मरण की जायेगी।
खड़ी बोली को गद्य के क्षेत्र में प्रतिठित करने के साथ भारतेन्दु-वर्ग के लेखकों ने जो दूसरा महान् कांर्य किया वह है तत्कालीन नवीन विचारों से उद्वेलित राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को साहित्य में प्रतिमूर्त करने का। इस प्रकार उन्होंने साहित्य को जीवन के प्रसंग में लाकर खड़ा किया। भारतेन्दु और उनके साथियों ने मिलकर साहित्य के क्षेत्र से रीतिकालीन प्रवृत्तियों को जड़-मूल से निकाला और उनके स्थान में नवीन भावनाओं, विचारधाराओं और चेतना को स्थापित किया। यह इस युग की दूसरी महान् उपलब्धि है।
साहित्य-भण्डार की पूर्ति की दृष्टि से भारतेन्दु-युग में यों तो साहित्य के अनेक ग्रंथों पर ध्यान गया, पर नाटक और निबन्ध उस युग की विशेष देन है। नाटककारों में स्वयं भारतेन्दु का नाम सर्वश्रेष्ठ है। निबन्ध- लेखकों में भारतेन्दु के अतिरिक्त प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट आदि लेखक उल्लेख्य हैं। उपन्यास-लेखन की ओर भी प्रवृत्ति लक्षित होती है। हिन्दी का प्रथम उपन्यास 'परीक्षा-गुरु' इसी काल में लिखा गया। पर मौलिक उपन्यासों की अपेक्षा अंग्रेज़ी, बंगला, संस्कृत से अनुवादों की संख्या अधिक थी। इतिहास और जीवन-वृत्त लेखन का भी श्रीगणेश इसी युग में हो गया था। भारतेन्दु-लिखित 'इतिहास-तिमिर-नाशक' और जयदेव का 'जीवन-वृत्त' प्रसिद्ध हैं।
भारतेन्दु-युग में काव्य की भाषा ब्रजभाषा ही रही। ब्रजभाषा की काव्य-परम्पराएँ भी बहुत कुछ पुरानी वनी रहीं। परन्तु देश-भक्ति, लोक- हित, समाज-सुधार, मातृ-भाषा-प्रेम जैसे नए विषयों के समावेश द्वारा उसमें भी नए वातावरण की सृष्टि हुई और रीतिकालीन नायिका-भेद, नख-शिख-वर्णन के स्थान पर नई काव्यधारा का प्रवर्त्तन हुआ। अतः काव्य के क्षेत्र में भी भारतेन्दु-युग की अपनी उपलब्धि है।
⭕ द्वितीय चरणः द्विवेदी-युगः-
भारतेन्दु का अवसान उनकी 35 वर्ष की आयु में सन् 1885 में हुआ। उनके वर्ग के अन्य अवशिष्ट लेखक बहुत समय बाद तक साहित्य- सेवा करते रहे। आधुनिक हिन्दी-साहित्य के द्वितीय उत्थान का आरम्भ सन् 1893 से माना जाता है। यह तिथि सुविधाजनक इसलिए है कि इसी वर्ष 'काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई, जो सचमुच ही हिन्दी-साहित्य-जगत की चिर-स्मरणीय घटना है। इसके कुछ ही समय बाद 'सरस्वती' पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ हुआ, जिसके सम्पादक के रूप में पंडित महावीरप्रसाद द्विवेदी का आगमन सन् 1900 ई. में हुआ। द्विवेदी जी ने एक पूरे युग पर अपने व्यक्तित्व की छाप छोड़ी, जिसके फलस्वरूप वह युग ही द्विवेदी-युग कहा जाता है।
भारतेन्दु और उनके सहयोगियों ने जिस खड़ीबोली की गद्य के लिए, प्रतिष्ठा की थी उसमें शक्ति थी, ओज था, भाव-प्रकाशन की क्षमता थी, पर उस काल के लेखकों का ध्यान व्याकरण की शुद्धता और भाषा के रूप की स्थिरता पर उतना नहीं गया था; उनके वाक्य-विन्यास में भी प्रायः शैथिल्य दिखाई पड़ता था। इन कमियों को द्विवेदी जी ने दूर किया। इसी से वे हमारी साहित्य-वाटिका के माली के नाम से विख्यात हैं।
गद्य के क्षेत्र में द्विवेदी-युग में कथा-साहित्य की विशेष प्रगति हुई। मौलिक उपन्यास लिखे जाने लगे। जैसे काव्य में गुप्त जी, वैसे ही उपन्यास में प्रेमचन्द जी की प्रतिभा का प्रस्फुटन यहीं से आरम्भ हुआ। इनका पूर्ण विकास हम आगे के युग में देखते हैं। इस युग के अन्य प्रतिनिधि कथाकार गुलेरी, कौशिक, सुदर्शन और ज्वालादत्त शर्मा है। अन्य भाषाओं से अनुवाद का क्रम पहले युग जैसा ही चलता रहा।
भारतेन्दु-युग में जिन दो साहित्यांगों, नाटक और निवन्ध की उन्नति हुई थी, द्विवेदी-युग में वह रुक-सी गई। उपन्यासों के प्रति वढ़ती हुई रुचि के कारण नाटक की प्रगति विशेष रूप से अवरुद्ध प्रतीत होती है।
साहित्य-समालोचना की वास्तविक नींव इसी युग में पड़ी, यद्यपि नाम के लिए इस विषय में थोड़ा कार्य भारतेन्दु-युग में हो गया था। द्विवेदी जी ने 'सरस्वती' में नवीन पुस्तकों की 'समीक्षा' के रूप में यह कार्य आरम्भ किया। फिर 'हिन्दी कालिदास की आलोचना', 'विक्रमांक देव चरित चर्चा', 'नैषध- चरित-चर्चा', 'कालिदास की निरंकुशता' आदि आलोचनात्मक पुस्तकों द्वारा उन्होंने अपने साहित्य के इस विशेष अंग की पूर्ति की। मिश्रवन्धुओं ने ऐतिहासिक आलोचना की पद्धति 'नवरत्न' लिखकर चलाई। पद्मसिंह शर्मा, कृष्ण विहारी मिश्र और लाला भगवानदीन ने बिहारी और देव को लेकर हिन्दी में तुलनात्मक आलोचना को जन्म दिया।
साहित्यिक दृष्टि से जीवन चरित लिखने का काम पंडित माधवप्रसाद मिश्र ने 'स्वामी विशुद्धानन्द' लिखकर आरम्भ किया। फिर बाबू शिवनन्दन सहाय ने हरिश्चन्द्र, गोस्वामी तुलसीदास और चैतन्य महाप्रभु की जीवनियाँ लिखीं।
ऊपर जिन साहित्यांगों का वर्णन हुआ है उनका आरम्भ किसी-न- किसी रूप में भारतेन्दु-युग में हो चुका था। जिस साहित्य-अवयव का आरम्भ द्विवेदी-युग में सर्वथा नया हुआ वह है कहानी। हिन्दी की सर्वप्रथम मौलिक कहानी पंडित किशोरीलाल गोस्वामी लिखित 'इन्दुमती' है जो 1900 में 'सरस्वती' में प्रकाशित हुई थी। 'प्रसाद', 'कौशिक', जी.पी. श्रीवास्तव, ज्वालादत्त शर्मा, राधिकारमणसिंह, गुलेरी आदि कलाकारों ने द्वितीय उत्थान में कहानियाँ लिखकर कहानी-कला का रूप हिन्दी में स्थिर किया; परन्तु उसका पूर्ण उत्कर्ष तृतीय उत्थान में देखने को मिलता है।
⭕ तृतीय चरणः छायावाद युगः-
सन् 1918 में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के साहित्य से संयास ग्रहण करते-करते देश की परिस्थितियों में बड़ा भारी परिवर्तन संघटित हुआ। इसी समय प्रथम महायुद्ध की समाप्ति हुई, जिससे भारतीयों ने बहुत अधिक राजनैतिक आशा लगी रखी थी, पर जिसका परिणाम उन्हें जलियाँ वालावाग के भीषण नर-हत्याकांड के रूप में भुगतना पड़ा। देश में अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध विक्षोभ की लहर दौड़ने लगी जिसका सक्रिय रूप गांधी जी के नेतृत्व में 1921 के असहयोग आन्दोलन में देखने को मिला। युद्ध के फलस्वरूप जीवन की आवश्यक वस्तुओ के अभाव में होड़ सी मच गई। आर्थिक विषमता का विकराल रूप दिखाई पड़ने लगा। इनका प्रभाव साहित्य पर होना अनिवार्य था। द्विवेदी-युग की साहित्यिक प्रवृत्तियों के विरुद्ध भी प्रतिक्रिया आरम्भ हो गई थी। सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक क्षेत्रों में द्विवेदी-युग 'यथा-स्थिति' का समर्थक था, जिसका तात्पर्य, दूसरे शब्दों में, यह है कि वह प्रगति का विरोधी था। साहित्य में उसकी इतिवृत्तात्मकता, नीरस भावाभिव्यक्ति-शैली और पुराण-पंथी आदतों से लोगों को ऊब हो चली थी। अंग्रेज़ी और बँगला के प्रभावों से हिन्दी साहित्य की नई प्रतिभाएँ नई दिशा की खोज में लग गई थीं।
तृतीय चरण में हिन्दी-काव्य का क्षेत्र नवीन परिस्थितियों का सबसे अधिक प्रतिविम्वित करने वाला हुआ। भाव और भाषा दोनों दृष्टियों से इसने इतनी अधिक महत्ता अर्जित की कि पूरे युग को यह अपना नाम दे गया। 1928 ई. से 1936 ई. तक के समय को 'छायावाद-युग' के नाम से अभिहित करने का मुख्य कारण यही है कि इस युग में काव्य की छायावादी प्रवृत्ति प्रधान रही। द्विवेदी-युग से विल्कुल स्वतंत्र नया वस्तु- विधान, नई अभिव्यंजना-शैली, नया छन्द-विधान, गीति, कल्पना, लाक्षणिकता, प्रगल्भता, व्यक्ति-स्वातन्त्र्य-उद्घोष, प्रकृति-प्रेम आदि इस नवीन प्रवृत्ति की कुछ उल्लेख्य विशेषताएँ हैं। 'प्रसाद', 'पंत', 'निराला' छायावाद के प्रवर्त्तक हैं। बाद में महादेवी वर्मा, रामकुमार वर्मा, भगवतीचरण वर्मा आदि कवियों ने इस धारा को अग्रसर करने में सहायता की। पचासों नाम इस सम्बन्ध में और गिनाए जा सकते हैं।
छायावादी काव्य के अतिरिक्त तृतीय चरण की मुख्य सफलता उपन्यास और कहानी के क्षेत्र में रही। प्रेमचन्द ने 'रंगभूमि', 'कर्मभूमि', 'गवन', 'निर्मला', 'प्रेमाश्रम' आदि उपन्यासों द्वारा गांधी जी की राजनीतिक और सामाजिक विचारधारा का साहित्य में प्रतिनिधित्व किया और साथ ही मानव-प्रकृति का निरूपण भी भली-भाँति कर दिखाया। वृन्दावनलाल वर्मा ने 'गढ़-कुँडार' और 'बिराटा की पद्मिनी' लिखकर ऐतिहासिक उपन्यास का मार्ग प्रशस्त किया। उपन्यासों से भी प्रचुर विकास छोटी कहानियों का हुआ। यहाँ भी प्रेमचन्द ने ही मार्ग-प्रदर्शन किया। उपन्यास- कहानी के क्षेत्र में इस युग में जितने लेखक हुए उनकी संख्या छायावादी कवियों से कम कदापि न होगी।
तीसरा साहित्यांग जो इस युग में समृद्धि को प्राप्त हुआ वह नाटक है। दूसरे उत्थान में इसकी गति अवरुद्ध थी। इस तीसरे उत्थान में पहुँचकर यह नई उमंग से आगे बढ़ा। प्राचीनता का आवरण छोड़कर इसने नवीन अथवा पाश्चात्य रूप उत्तरोत्तर अपनाया। 'प्रसाद' और 'प्रेमी' ने ऐतिहासिक नाटकों से हिन्दी को उपकृत किया तो उदयशंकर भट्ट ने पौराणिक कथावस्तु को अपनाया। सेठ गोविन्ददास ने वर्तमान जीवन से सम्बन्धित राजनीतिक और सामाजिक पक्षों को लिया तो लक्ष्मीनारायण मिश्र ने 'समस्या' नाटक लिखे। 'उग्र', पंत आदि जाने कितने नाटककार इस तृतीय उत्थान में उत्पन्न हुए, जिनकी रचनाओं से साहित्य की श्रीवृद्धि हुई।
निबन्ध-लेखकों में प्रमुख नाम पंडित रामचन्द्र शुक्ल का है, और यह एक अकेला नाम ही हिन्दी निबन्ध-साहित्य की गरिमा का घोष करने के लिए पर्याप्त है। 'चिन्तामणि' हिन्दी का गौरव-ग्रन्थ है। गद्य-काव्य नाम का नया साहित्यांग इस चरण में उद्भूत होकर पल्लवित हुआ। गद्य-काव्य ग्रन्थों के प्रणेता कई हुए जिनमें चतुरसेन शास्त्री, वियोगी हरि, राय कृष्णदास, रघुवीर सिंह प्रमुख हैं।
साहित्य के इतिहास-लेखन का कार्य भी इसी युग में वैज्ञानिक ढंग से हुआ। आचार्य शुक्ल का 'हिन्दी साहित्य का इतिहास', आचार्य श्यामसुन्दरदास का 'हिन्दी भाषा और साहित्य', रामकुमार वर्मा का 'विवेचनात्मक इतिहास' आदि इसी युग में प्रकाशित हुए।
इस तृतीय चरण में समालोचना का आदर्श भी बदला। गुण-दोष के कथन के आगे बढ़कर कवियों की विशेषताओं और उनकी अन्तःप्रवृत्ति की छानबीन की ओर भी ध्यान दिया गया। आचार्य शुक्ल द्वारा लिखित सूर, तुलसी और जायसी पर आलोचनाएँ इस दिशा को बताने वाली हुई। फिर तो 'कलाओं' और 'साधनाओं' का ताँता बँध गया। पचासों की संख्या में प्राचीन और अर्वाचीन कवियों की 'कला' और 'काव्य-साधना' पर पुस्तकें प्रकाशित हुईं जिनसे हमारा समीक्षा-साहित्य समृद्ध बना। कृष्णशंकर शुक्ल की 'केशव की काव्य-कला', सत्येन्द्र की 'गुप्त जी की कला' जनार्दन झा द्विज की 'प्रेमचन्द की उपन्यास-कला', अखौरी गंगाप्रसादसिंह की 'पद्माकर की काव्य-साधना', सुमन-कृत 'प्रसाद की काव्य-साधना', भुवनेश्वर प्रसाद मिश्र-कृत 'मीरा की प्रेम-साधना' आदि केवल पहले खेमे की रचनाएँ हैं। बाद में कितने ही और एक-से-एक बढ़कर सफल समालोचना-ग्रन्थ प्रकाशित हुए। विशेष कवियों की आलोचना के अतिरिक्त साहित्य-समीक्षा-सिद्धान्त पर भी पुस्तकें लिखी गई और कला के सम्बन्ध में सोच-विचार हुआ।
⭕ चतुर्थ चरण - प्रगतिवाद-युगः
1936 के आस-पास विश्वव्यापी आर्थिक मन्दी अपनी चरम सीमा को पहुँच गई। वस्तुओं के मूल्य में अकल्पनीय ह्रास हुआ; परिणामस्वरूप उनके उत्पादक कृषक और मज़दूर आर्थिक विषमता की चक्की में बुरी तरह पिसे। प्रथम महायुद्ध के प्रतिक्रिया के रूप में यह मन्दी शुरू हुई थी। उसे रोकने का प्रयत्न तो दूर रहा, संसार की महान् शक्तियाँ दूसरे महायुद्ध की तैयारी में जी-जान से लग गई थीं। संसार मानो गोले-बारूद के ढेर पर बैठा था। भारतीय समाज में भी त्राहि-त्राहि मची थी। देश के स्वातन्त्र्य युद्ध की धार जितनी ही तेज हो गई थी, आर्थिक दशा उतनी ही क्षीण थी। शासकों का अत्याचार, निहित स्वार्थों का शोषण अपनी सीमा पर था। ऐसे ही समय में सुमित्रानन्दन पंत का 'युगान्त' प्रकाशित हुआ और युग की प्रवृत्तियों का दर्पण 'साहित्य' मानो एक नए युग में प्रविष्ट हुआ। जव राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के विरुद्ध प्रतिक्रिया शुरू हो गई हो तो कैसे सम्भव था कि हिन्दी साहित्य 'छायावाद' की छाया-सदृश कोमल भाव-भूमि पर विचरण करता रहता। उसे वहाँ से उतर कर यथार्थवाद की कठोर भूमि पर आना ही था।
चतुर्थ चरण का जो दूसरा नाम प्रगतिशील-युग है उसका कारण यही है कि इस युग में किसानों, मजदूरों और शोषितों के उद्धार की ओर कवियों और लेखकों का ध्यान गया है। गद्य के क्षेत्र में प्रेमचन्द ने प्रगति का मार्ग वताया। 1936 में हुए 'प्रगतिशील लेखक संघ' के प्रथम अधिवेशन का सभापतित्व उन्हीं के द्वारा हुआ। 'गांधीवाद' से आस्था हटाकर यथार्थवादी बनकर वह कहीं और जा रहे थे, इसका पक्का प्रमाण वह 'गोदान' में मरते-मरते दे गए। काव्य के क्षेत्र में नवीन प्रवृत्ति का सृजन पंत जी के द्वारा हुआ, इसका संकेत हमने ऊपर किया है।
हम हिन्दी साहित्य के चतुर्थ चरण के मध्य से निकल रहे हैं, अतः उसकी उपलब्धियों पर कुछ कह सकना कठिन है। प्रत्यक्ष देखने में यह आ रहा है कि यह चरण 'वादों' का है। काव्य के क्षेत्र में न केवल 'प्रगतिवाद' का वोलवाला है, वरन् प्रतीकवाद और प्रयोगवाद का भी ज़ोर है। फ्रायड के मनोविश्लेषणवाद का भी प्रभाव कम नहीं है। साम्यवाद और समाजवाद प्रगतिवाद के मुख से वोल रहे हैं। काव्य, कहानी, उपन्यास, नाटक, आलोचना सभी क्षेत्रों में सम्प्रति प्रगति हो रही है, पर किसी न किसी 'वाद' की छाया में। यह खटके की बात भी है।
हिन्दी गद्य साहित्य की आधुनिक विधाएँ:-
🍓 नाटक:-गद्य की यह प्राचीन विधा है। इसके रचना-विधान में पद्म का भी प्रयोग किया जाता है। प्राचीन काल में नाटक को रूपक का एक भेद माना जाता था। आजकल रूपक के अर्थ में नाटक का प्रयोग शामिल हो गया है। नाटक में दो विपरीत समस्याओं या स्थितियों का संवादों के माध्यम से द्वन्द्वात्मक प्रस्तुतीकरण होता है। भारतेन्दु, प्रसाद, हरिकृष्ण प्रेमी, मोहन राकेश, लक्ष्मीनारायण लाल आदि प्रसिद्ध नाटककार हैं। नाटक की एक विधा एकांकी है। रेडियो नाटक भी इसी वर्ग में आते हैं। एकांकी नाटककारों में रामकुमार वर्मा, उपेंद्रनाथ अश्क, विष्णु प्रभाकर आदि प्रमुख हैं।
🍓 उपन्यासः- मध्यवर्गीय यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए गद्य की व्यापक विधा उपन्यास का विकास पश्चिम के नॉवेल की प्रेरणा से हुआ है। साहित्य समाज का दर्पण है, यह उक्ति उपन्यास के लिए सबसे अधिक चरितार्थ होती है। मानव-चरित्र के व्यापक क्षेत्र से सम्बद्ध यह विधा महाकाव्य का विकल्प बनती जा रही है। कुछ उपन्यासों के लिए महाकाव्यात्मक विशेषण प्रयुक्त होने लगा है। प्रेमचन्द, भगवतीचरण वर्मा, जैनेन्द्र, यशपाल, अज्ञेय, अश्क आदि उपन्यासकारों ने इस विधा को समृद्ध किया है।
🍓कहानी:- जीवन के किसी एक प्रसंग या स्थिति या अनुभव को कलात्मक कसावट के साथ एक निश्चित आयाम और शिल्प में प्रस्तुत करने वाली गद्य विधा को कहानी कहते हैं। उपन्यास में जीवन की विविध घटनाओं को व्यापक रूप से ग्रहण किया जाता है, किन्तु कहानी में कोई एक मार्मिक घटना या प्रसंग होता है। कहानी का विकास तेजी से चरम सीमा की ओर होता है, चरम सीमा पर ही उसकी समाप्ति हो जाती है। इसमें निश्चित परिणति या फलागम का आग्रह नहीं रहता। प्रेमचन्द, प्रसाद, अज्ञेय, जैनेन्द्र, कमलेश्वर, मन्नू भंडारी शिवानी आदि हिन्दी के प्रसिद्ध कहानीकार हैं।
🍓 निवन्ध :- गद्य की अन्य विधाओं की तुलना में आधुनिक विधा है। इसमें किसी विषय का आत्मिक स्वच्छन्दता, स्वनिर्मित अनुशासन के साथ एक निश्चित सीमा के अन्तर्गत विवेचन किया जाता है। इसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्तित्व की छाप रहती है। वर्णनात्मक, विवरणात्मक, विचारात्मक और भावात्मक इसके कई भेद हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी, शांतिप्रिय द्विवेदी, वासुदेवशरण अग्रवाल, गुलाबराय, कुबेरनाथ राय, आदि हिन्दी के श्रेष्ठ निबंधकार हैं।
🍓 आलोचनाः-किसी साहित्यिक कृति का सम्यक् रूप से परीक्षण,विश्लेषण एवं विवेचन को आलोचना कहते हैं। समीक्षा, अनुशीलन, समालोचना आदि अन्य इसके पर्याय हैं। आलोचना के क्षेत्र में शुक्लजी के अतिरिक्त नंददुलारे वाजपेयी, हज़ारी प्रसाद द्विवेदी, डा. नगेन्द्र, डा. रामविलास शर्मा आदि का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।
🍓 जीवनी:- इस विधा में किसी लेखक या महापुरुष के जीवन की घटनाओं, क्रिया-कलापों तथा अन्य गुणों का वर्णन बड़ी आत्मीयता के साथ गम्भीर एवं व्यवस्थित ढंग से किया जाता है। जीवनी लेखक व्यक्ति विशेष के जीवन की उन घटनाओं को विशेष रूप से उजागर करता है जो पाठकों के लिए प्रेरणादायक होती हैं। गुलाबराय, रामविलास शर्मा, अमृतराय आदि ने हिन्दी के जीवनी साहित्य को विकसित किया है।
🍓 आत्मकथाः- यह भी एक तरह की जीवनी है। आत्मकथा में व्यक्ति अपने विषय में स्वयं लिखता है, जब कि जीवनी भिन्न व्यक्ति के द्वारा लिखी जाती है। श्यामसुंदरदास, सेठ गोवनिद दास, डा. राजेन्द्र प्रसाद, बच्चन आदि ने प्रेरक आत्मकथाएँ लिखी हैं।
🍓 रेखाचित्र:- चित्रकला के आधार पर 'रेखाचित्र' वस्तुतः अंग्रेज़ी के 'स्खेत्व' Sketch और "पोट्रेट पेंटिंग" Portrait painting के समान है। 'रेखाचित्र' अथवा 'शब्दचित्र' वाली विधा अधिक प्रचलन में आयी है। जिस प्रकार कुछ थोड़ी-सी रेखाओं का प्रयोग करके चित्रकार किसी व्यक्ति या वस्तु की मूलभूत विशेषता को उभार देता है, उसी प्रकार कुछ थोड़े शब्दों में साहित्यकार किसी व्यक्ति या वस्तु की विशेषता को सजीव कर देता है। महादेवी वर्मा, बनारसी दास चतुर्वेदी, श्रीराम शर्मा, रामवृक्ष बेनीपुरी आदि ने उत्कृष्ट रेखाचित्रों का सृजन किया है।
🍓संस्मरणः - संस्मरण का अर्थ है सम्यकु स्मरण करना। इसमें लेखक किसी घटना या वस्तु या व्यक्ति से जुड़े हुए अनुभवों को कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करता है। स्मरणीय व्यक्ति कोई महापुरुष ही होता है। इसमें तथ्य परकता अधिक होती है। यशपाल, रामवृक्ष बेनीपुरी, महादेवी वर्मा आदि अनेक लेखकों ने महापुरुषों से सम्बद्ध अपने संस्मरण लिखे हैं। यात्रा साहित्यः- इसमें यात्रा सम्बन्धी वृत्तांत होता है। यह साहित्य करोचक और मनोरंजक विधा है। यात्रा साहित्य के प्रमुख लेखकों में अज्ञेय, न राहुल सांकृत्यायन, दिनकर, प्रभाकर माचवे आदि के नाम लिये जा सकते हैं।
🍓 पत्र-साहित्यः- साहित्यकारों तथा चिन्तकों द्वारा लिखित पत्रों को भाषा की साहित्यिकता तथा विचारात्मकता के कारण साहित्य की कोटि में रखा जाता है। महाबीर प्रसाद द्विवेदी के पत्रों को द्विवेदी पत्रावली, प्रेमचन्द के पत्रों को चिट्ठी-पत्री के नाम से संकलित किया गया है।
🍓 डायरी:- साहित्यकार नित्य प्रति के अनुभवों को मानसिक प्रतिक्रिया के साथ अपनी डायरी में नोट कर लेते हैं। कतिपय दृष्टियों से इनका भी साहित्यिक महत्व माना जाता है। देवराज ने 'अजय की डायरी' नाम से डायरी शैली में एक उपन्यास भी लिखा है।
🍓 रिपोर्ताज:- किसी घटना को अपने मूल्यों और आदर्शों के अनुसार प्रस्तुत करना रिपोर्ताज कहलाता है। रांगेय राघव रचित "तूफानों के बीच" और रघुवीर सहाय की 'सीढ़ियों पर धूप में' इसी तरह की रचनाएँ हैं।
🍓 इंटरव्यूः - श्रेष्ठ साहित्यकार, राजनेता, कलाकार, दार्शनिक, वैज्ञानिक आदि से किसी विषय से सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर का प्रस्तुतीकरण इन्टरव्यू कहलाता है। पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो व दूरदर्शन में इस विधा का पर्याप्त विकास देखने में आता है। डॉ. पद्मसिंह शर्मा कमलेश, देवेन्द्र सत्यार्थी, रणवीर रांग्रा आदि ने इस विधा के माध्यम से अनेक हस्तियों का परिचय दिया है।
🍓 केरीकेचरः- स्वभाव, शारीरिक अंग, चित्र, नाटक आदि से अत्युक्तिपूर्ण व्यंग्यात्मक या विकृत चित्रण जो हास्य उत्पन्न करे, उसे केरीकेचर कहते हैं। धर्मवीर भारती का 'ठेले पर हिमालय' ऐसी ही रचना है।
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